Category: साहित्य

ना रही बाँस ना बाजी बाँसुरिया

– अभय कृष्ण त्रिपाठी “विष्णु” सच बोलहू में अब सवाल हो रहल बा, खुदके मिटावे खातिर बवाल हो रहल बा, ना रही बाँस ना बाजी बाँसुरिया ऐ विष्णु, कफ़न ओढावे खातिर कमाल हो रहल बा़॥ महाभारतानुसार अब गुरु शिक्षक हो रहल बा,...

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रमबोला के याद करत आपन बात

– ओम प्रकाश सिंह साल 1975 भा 1976 रहुवे जब पहिला बेर हमरा एगो भोजपुरी के खण्डकाव्य रमबोला के जानकारी एगो दोस्त से मिलल. ऊ हमरा के ओह काव्य के एगो अंश भेजले रहुवन जवना के हम आपन एगो पत्रिका भोजपुरिहा के पहिलका अंक में शामिल...

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कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो

– कमलाकर त्रिपाठी बाँके बिहारी घर से दुई-तीन कोस चलल होइहँ कि ओनकर माई चिल्लइलिन, ”रोका हो गड़िवान, दुलहिन क साँस उल्टा होय गइल.“ बाँके लपक के लढ़िया के धूरा पर गोड़ राखि के ओहार हटाय के तकलन – ”का भइल रे?“ ”होई का ए...

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लाल निशान

– बिन्दु सिन्हा किर्र…. दरभंगा सकरी रोड पर सन्नाटा भइला से बस आउर ट्रक के चाल अइसहीं तेज हो जाला. झटका से ब्रेक लेला से खूब तेज चलत ट्रक एक-ब-एक किरकिरा उठल. ट्रक का डाला पर बइठल खलासी बीड़ी पीयत कवनो फिल्मी धुन...

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एही शौचालय की कारन ही ससुरा त्याग, नैहर में लौट गइली दुलहिनिया

– नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती बदली समाज अब स्वच्छता अभियाने से, जागरुक होत हई घर-घर बबुनिया. बाबुजी हमरा के ओइजा ना बिअहब, जवना घरे बनल ना होई लैटिनिया. देखीं महराजगंज प्रियंका सखी का कइली, ससुरा के छोड़ मायका गइली...

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