Category: साहित्य

पारंपरिक निरगुन

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ (1) के रे जनम दिहलें, के रे करम लिखलें कवन राजा आगम जनावेलें हो राम ।। ब्रम्हाजी जनम दिहलें, उहे रे करम लिखलें, जम राजा आगम जनावेलें हो राम।। माई-बाप घेरले बाड़े मुँहवा निरेखत बाड़ें हंस...

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नेट पर भोजपुरी के एगो युग पूरा होखे का मौका पर

आजु से बारह बरीस पहिले भोजपुरी के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डाॅटकाॅम के शुुरुआत भइल रहुवे. तब से आजु ले बहुते कुछ बदल गइल. नेट पर सैकड़ो वेबसाइट हो गइल बाड़ी सँ भोजपुरी के. अलग बात बा कि भोजपुरी में ना चला के ओकनी में से अधिका...

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झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया लागेला नीक ना । हँसे सगरी बधरिया लागेला नीक ना । सरग बहावेला पिरितिया के नदिया छींटे असमनवा से चनवा हरदिया धरती पहिरि लिहली हरियर चुनरिया लागेला नीक ना । नील रंग के...

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ना रही बाँस ना बाजी बाँसुरिया

– अभय कृष्ण त्रिपाठी “विष्णु” सच बोलहू में अब सवाल हो रहल बा, खुदके मिटावे खातिर बवाल हो रहल बा, ना रही बाँस ना बाजी बाँसुरिया ऐ विष्णु, कफ़न ओढावे खातिर कमाल हो रहल बा़॥ महाभारतानुसार अब गुरु शिक्षक हो रहल बा,...

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रमबोला के याद करत आपन बात

– ओम प्रकाश सिंह साल 1975 भा 1976 रहुवे जब पहिला बेर हमरा एगो भोजपुरी के खण्डकाव्य रमबोला के जानकारी एगो दोस्त से मिलल. ऊ हमरा के ओह काव्य के एगो अंश भेजले रहुवन जवना के हम आपन एगो पत्रिका भोजपुरिहा के पहिलका अंक में शामिल...

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