अमेरिका-ईरान समझौता: दलाल पाकिस्तान
- टीम अंजोरिया

pakistan a broker state अप्रैल 2026 में पाकिस्तान आ ईरान के बीच भइल हालिया घटनाक्रम क्षेत्रीय राजनीति आ वैश्विक कूटनीति दुनो खातिर खास महत्व रखेला. एक ओर व्यापार आ ट्रांजिट से जुड़ल समझौता भइल, त दुसर ओर अमेरिका–ईरान संघर्ष में पाकिस्तान मध्यस्थ के रूप में सामने आइल. ई दूनों पहलू से पाकिस्तान के कुछ समय खातिर एगो सक्रिय कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में पहचान मिलल, लेकिन कुछ खास नतीजा ना निकलल.

व्यापार आ ट्रांजिट समझौता: आर्थिक सहयोग के नया राह

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के पाकिस्तान दौरा के दौरान माल ढुलाई खातिर महत्वपूर्ण सहमति बनल. हाल ही में पाकिस्तान, ईरान खातिर छह गो नया जमीनी रास्ता खोल दिहलस. जवना से अब तिसरका देश से आवे वाला सामानो पाकिस्तान के रास्ता ईरान पहुँच सकेला.

“ट्रांजिट ऑर्डर 2026” लागू कइला के बाद ग्वादर, पोर्ट कासिम आ तफ्तान जइसन रास्ता से माल भेजल जा सकेला. एहसे कराची और ग्वादर पोर्ट से व्यापार बढ़ जाई. पाकिस्तान का फायदा होई कि उ अफगानिस्तान के उपक्षा करके ईरान के रास्ते मिडिल ईस्ट में आपन पहुँच बना लेई.

अमेरिका–ईरान संघर्ष में पाकिस्तान के मध्यस्थता

2026 के अमेरिका–ईरान संघर्ष में पाकिस्तान एगो मध्यस्थ के रूप में भूमिका निभावे के कोशिश कइलस. 8 अप्रैल 2026 के अस्थायी युद्धविराम पाकिस्तान के पहल से संभव भइल. एहके बाद इस्लामाबाद में उच्च स्तरीय बातचीत आयोजित भइल, जवन के अगुवाई शहबाज शरीफ, आसिफ मूनीर आ इशाक डार कइलन. अमेरिकी पक्ष के नेतृत्व J. D. Vance कइलन, जबकि ईरान के ओर से मोहम्मद बाघर घलिबाफ शामिल रहलन.

ई बातचीत इतिहास के दोहरावे ला रहे जईसन कि 1979 में निक्सन चीन से बातचीत करे खातिल पाकिस्तान के सहारा लेहेल रहलन. 1979 के बाद एकबार फिर इ सबसे महत्वपूर्ण सीधा संवाद मानल गइल.

मध्यस्थता के विफलता

शुरुआती सफलता के बावजूद ई पहल आखिरकार असफल हो गइल. मुख्य कारण रहल अमेरिका आ ईरान के बीच गहरा अविश्वास आ कड़ा शर्त जेकरा माने ला ईरान तैयार ना रहे. अमेरिका चाहत रहल कि ईरान आपन परमाणु कार्यक्रम खत्म कर दे, लेकिन ईरान एह बात के सख्ती से खारिज कर दिहलस.

दोसरा तरफ, ईरान अमेरिका पर अनुचित मांग थोपे आ एक साथ सैन्य दबाव बनावे के आरोप लगवलस. अंत में अविश्वास एतना बढ़ गइल कि आगे के बातचीत रद्द हो गइल.

भारत के प्रतिक्रिया आ “दलाल देश” विवाद

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर, पाकिस्तान के भूमिका पर टिप्पणी करत ओकरा के “दलाल देश” कहले. इ बयान पर बहुते बवाल भईल, लेकिन ई बयान भारत के रणनीतिक स्वायत्तता के मजबूत संकेत देवे वाला रहल.

भारत खुद के एगो बिचौलिया के तौर पर स्थापित कइला से बचल चाहत रहल, ऐही से ई नीति अपनवले बा. हालांकि, कुछ अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक एह भाषा के कूटनीतिक रूप से कठोर मानलन. लेकिन पाकिस्तान के अतीत साबित करे खातिर पर्याप्त बा कि उ एगो दलाल देश ह, जवन अपना फायदा खातिर कुछहू कर सकेला.

का भारत कूटनीतिक रूप से कमजोर पड़ रहल बा?

ई कहना सही ना होई कि भारत कवनो गंभीर मुसीबत में बा, लेकिन ई घटना ओकर विदेश नीति खातिर चुनौती जरूर बनल. भारत मे विपक्षी दल एगो मुद्दा बना लेहले कि पाकिस्तान के प्रभाव अउर महत्व भारत से ज्यादा हो गईल. पाकिस्तान के मध्यस्थता से ओकर वैश्विक छवि में कवनो सुधार ना भइल. काहे से कि अब इ बात उजागर हो गईल बा कि पाकिस्तान, मध्यस्तथा के आड में दोहरा गेम खेललस अउर अमेरिका के प्रतिबन्ध के बावजूद ईरान से अपना पोर्ट खोलेला करार क लेहलस. जेकरा बाद अब चीन से CPEC खातिर अउर 25 बिलियल डालर माँगता.

भारत के स्थिति

भारत हमेशा से संतुलित विदेश नीति अपनवले बा. एक ओर अमेरिका आ इज़राइल से मजबूत संबंध बा, त दुसर ओर ईरान में चाबहार पोर्ट जइसन प्रोजेक्ट भारत के दीर्घकालिक हित के हिस्सा बा. एह वजह से भारत के कवनो एक पक्ष के “पिछलग्गू” कहना सही ना होई. दरअसल, भारत एगो कठिन कूटनीतिक संतुलन बना के चले के कोशिश करत बा. जइसे कि आग में आपन घर कईसे बचावल जाव.

पाकिस्तान 2026 में एगो बड़ा कूटनीतिक मौका के इस्तेमाल करत खुद के वैश्विक मंच पर पेश कइलस, लेकिन ओकर मध्यस्थता टिकाऊ साबित ना हो पाइल. भारत आपन स्वतंत्र विदेश नीति के स्पष्ट संकेत दिहलस, चाहे ओकर भाषा पर बहस काहे ना भइल होखे. आखिर में ई पूरा घटनाक्रम ई बतावेला कि कूटनीति में स्थायी जीत या हार ना होला, बल्कि हालात के हिसाब से रणनीति बदलत रहेला.

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