स्व. कैलाश चन्द्र चौधरी उर्फ मास्टर साहब के कविता
खालऽ, खालऽ ए चिरई जवन तोहरा रुचे उड़ते खा, चाहे बइठ के खालऽचाहे अलोता कहीं ले जाके खालऽटुकी टुकी...
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