श्रेणी: भाषा

बतकुच्चन १०६

आजु पता ना काहे मन करत बा कि बिर्हनी के छत्ता खरकोंच दी. काहे कि एने कुछ दिन से मधुमाखी के छत्ता चरचा में आ गइल बा. अब मधुमाखियन के भरभरा के निकल पड़े खातिर अतने बहुत बा. बिना कुछ अउर बोललहू लोग भँभोरे निकल पड़ी बाकिर आजु त कहला...

Read More

बतकुच्चन १०५

“अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया ए ननदी सईंया के जगा द, रसे रसे उठेला लहरिया ए ननदी, सईंया के...

Read More

बतकुच्चन – १०४

“डोलिए में अइनीं, डोलिए में गइनीं, डोलिए में रहि गइल पेट. ए सासु जी तोहरे किरिया सईंया से नाहीं भेंट.” एक जमाना रहुवे छायावादी कवियन के. बात के घुमा के अइसे कहीहें कि कुछ लोग बूझी कुछ ना. कविता के खजुराहो जस होला...

Read More

बतकुच्चन १०२

पिछला हफ्ता एक जने के पटावे खातिर दोसरा जने के पठा दिहल गइल. जिनका के पठावल गइल से ओह राज्य के पालक रहलें आ लोग कहत बा कि एह बहाने उनुका के पटावे के कोशिश कइल गइल बा जिनकर सहारा अगिला साल के चुनाव का बाद लेबे के जरूरत पड़ सकेला....

Read More

Recent Posts

पाठक-पाठिकन के राय विचार प्रतिक्रिया..