Category: भाषा

बतकुच्चन – १००

पिछला कुछ महीना से फाँसी का फैसला पर गृहमंत्रालय अतना फदफदा गइल बा कि ताबड़तोड़ फाँसी सकारे के सलाह दिहले जात बा. अब एह बात पर बहुते कुछ मन करे लागल कहे सुने के. बाकिर आजु के हालात अइसन हो गइल बा कि बतियावे के आजादी भले होखे बतावे...

Read More

बतकुच्चन – ९९

लाजे भवहि बोलसु ना, सवादे भसुर छोड़सु ना. अब एह बाति पर भड़कला के कवनो जरूरत नइखे. ई कहाउत हमार बनावल ना ह आ जमाना से चलल आवत बा. इहो बाति नइखे कि हमरा फगुनाहट लाग गइल बा. काहे कि फागुन के आहट बतावे वाला बयार अब भेंटात नइखे...

Read More

बतकुच्चन – ९८

केहू ढुकल, केहू ढुकावल, आ केहू ढुका लागल देखत रहि गइल. ढकना, ढकनी, ढाकल, तोपल त बहुते सुनले बानी आजु ढुकले पर चरचा कर लिहल जाव. ढुकल आ घुसल दुनु के मतलब एके जस होला. धेयान दीं एके जस, एके ना. काहे कि घुसल कहला में तनी सीनाजोरी,...

Read More

"फगुआ के पहरा" पर एक नजर

– मनोकामना सिंह ‘अजय’ आदरणीय डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल जी, सादर प्रणाम. अपने के भेजल “फगुआ के पहरा” सावन में भाई गंगा प्रसाद अरुण के मार्फत मिलल. राउर गजल के ई लाइन हमनी पर बिलकुल ठीक बइठत बा –...

Read More

बतकुच्चन – ९७

मन में एगो सवाल उठल बा कि पोसल आ पोसुआ में फरक होला कि ना? आ होला त का फरक होला. सवाल एह से उठल कि आजु चारो ओर पोसल आ पोसुआ लोग के भरमार हो गइल बा. केहू अपना चेला चाटी के पोसत बा त कुछ चेला चाटी पोसुआ होखत जात बाड़ें. अब देखीं...

Read More

Recent Posts