गज़ल
– डा0 अशोक द्विवेदी कुछ नया कुछ पुरान घाव रही तहरा खातिर नया चुनाव रही । रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही आँख में जबले भेद-भाव रही । अन्न- धन से भरी कहीं कोठिला छोट मनई बदे अभाव रही । भाव हर चीज के रही बेभाव जबले हमनी के ई...
Read More– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ जेठ भाई के निहोरा करऽ जन अनेत नेत, बबुआ सुधारऽ सुनऽ, तूँही ना ई कहऽ काहे होला रोजे रगड़ा । आपन कमालऽ खालऽ, एनहूँ बा उहे हालऽ आर ना डरेड़ फेर, काहे ला ई झगड़ा ।। चूल्हे नू बँटाला कहीं,...
Read Moreचलि गइल छोड़ि कवन देसवा हो बाबू, मिले नाहिं कवनो सनेसवा हो बाबू।। गोदिये से गइल, अवाक् रह गइनीं कवनो ना बस चलल, का का ना कइनी कुहुके करेजवा कलेसवा हो बाबू।। बबुआ तुँ रहल, एह अँखिया के जोति तोहरे ला झरेला, नयनवा से मोती हूक उठे...
Read More– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ सीमा के पाती, बॉंची जा एह चिठ्ठी में चीख बा। दिल्लीवालन भूल ना जाईं समाचार सब ठीक बा।। धान-पान सब सूख गइल बा खेत-मजूरा चूक गइल बा। पेट-पेट में कोन्हू नाचत हियरा-हियरा हूक गइल बा। घर में...
Read More
पाठक-पाठिकन के राय विचार प्रतिक्रिया..