Category: कविता

बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी आजु हमरा के नियरा बईठा के बाबूजी बहुते कुछ समुझवनी ह । दुनियाँ – समाज के रहन सभ हमरा के विस्तार मे बतवनी ह ॥ बाबूजी बहुते कुछ…. राजनीति के रहतब-करतब एने-ओने के ताक-झाँक बोली-ठिठोली के मतलबो आ...

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दू गो गजल

  – डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल 1. मन इ जब जब उदास होखेला तोहरे   आस-पास   होखेला   घर धुँआइल बा आँख लहरेला जब भी बुधुआ किताब खोलेला   तोहरा के भुला सकबि कइसे आजुओ मन लुका के रो लेला   चोर भइलीं भलाई ला...

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गज़ल

– डा0 अशोक द्विवेदी कुछ नया कुछ पुरान घाव रही तहरा खातिर नया चुनाव रही । रेवड़ी चीन्हि के , बँटात रही आँख में जबले भेद-भाव रही । अन्न- धन से भरी कहीं कोठिला छोट मनई बदे अभाव रही । भाव हर चीज के रही बेभाव जबले हमनी के ई...

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गजल

– डा0 अशोक द्विवेदी दउर- दउर थाकल जिनगानी कतना आग बुतावे पानी ! बरिसन से सपना सपने बा ; छछनत बचपन बूढ़ जवानी । हरियर धान सोनहुली बाली, रउरे देखलीं , हम का जानी ? कबहूँ -कबहूँ क्षुधा जुड़ाला जहिया सबहर जरे चुहानी । पूत...

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जयकान्त सिंह के तीन गो कविता – नया आ पुरान

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ जेठ भाई के निहोरा करऽ जन अनेत नेत, बबुआ सुधारऽ सुनऽ, तूँही ना ई कहऽ काहे होला रोजे रगड़ा । आपन कमालऽ खालऽ, एनहूँ बा उहे हालऽ आर ना डरेड़ फेर, काहे ला ई झगड़ा ।। चूल्हे नू बँटाला कहीं,...

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