लोक कवि अब गाते नहीं – ८
(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) सातवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं...
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Read More– जयंती पांडेय घर के बूढ़ पुरनिया कहेलन कि सब दिन होत न एक समाना. तुलसिओ बाबा एतना बड़ रामचरितमानस लिख के समुझवले बाड़न, “होइहें वही जो राम रचि राखा, को करि तरक बढ़ावहीं शाखा.” सचहूँ, समय बहुते बलवान होला. एकर...
Read Moreममता सिंह हालही में दि इण्डियन जर्नल फॉर कम्युनिटी मेडिसिन में एगो लेख पढ़े के मिलल जवना में दवा लिखे के आ डाक्टरी विचार विमर्श का बारे में शोध का दिशाईं एगो व्यापक अध्ययन का बाद पावल गइल कि “डाक्टरी परामर्श खातिर औसतन सात...
Read More– पाण्डेय हरिराम जिनगी माई के अँचरा के गाँठ जइसन होले. गाँठ खुलत जाले. कवनो में से दुख त कवनो में से सुख निकल आवेला. हमनी का अपना दुख में भा सुख में भुलाइल रहीले. ना त माई के अँचरा याद रहेला ना ओह गाँठ के खोल के माई के...
Read Moreआजु पता ना काहे मन अँउजाइल बा. लागत बा कि कंठ में कुछ अटकल बा अँउजार जइसन. आ कंठ का भीतर कुछ अटकल होखे त जान पर आफत बनि जाला कबो-कबो. अलगा बाति बा कि कंठ का बाहर लटकल कंठहार औरतन के सुंदरता बढ़ा देला. कंठ गवनई के सुरो के कहल...
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