बेहया शिरोमणि बनने के लिये कट्टर प्रतियोगिता

आजकल मेरा आना बहुत कम हो गया है अंजोरिया पर. क्योंकि आपने तो पहले ही मुंह मोड़ लिया है. जवानी के बीस बरस एक प्रेमिका से प्रेम के पागलपन में गुजार दिये. उसके घर वाले हमेशा मेरे विरोध में रहे. कभी उन्होंने खुले दिल से मेरा स्वागत नहीं किया. हाँ, इतना जरुर कहूंगा कि उन्होंने कभी दुत्कारा भी नहीं. अपनी प्रेमिका के लिये एक कसक अब भी बाकी है दिलो दिमाग में. पर ‘जिस दिल में बसा था प्यार तेरा, उस दिल को कभी का तोड़ दिया’. हाँ इतनी उम्मीद तब भी थी कि ‘मैं यह सोच कर तेरे दर से चला था कि तुम रोक लोगी, मना लोगी मुझको.’ पर सच्चाई तो यही थी न कि मेरा प्यार एक तरफा ही था.

अब उसके बाद की परिस्थितियों पर नजर डाली जाय. लेखक, कवि हूं नहीं कि रोज कुछ न कुछ नया लिख मारूं. फिर आजकल देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी ही रह गयी है कि आप देश को, देश के बहुसंख्यक समाज को, भाजपा को, मोदी को, योगी को जितनी चाहो गाली दे दो कुछ नहीं बिगड़ने वाला. हालांकि लिखते लिखते सोच रहा हूँ कि योगी को गाली देने के बाद भी कुछ नहीं बिगड़ेगा इसकौ कोई गारंटी नहीं.

समाचारों के अनगिन माध्यम हो गये हैँ. आजकल. अगर यू ट्यूब पर खबर तलाश लीजियेगा तो एक से बढ़कर एक ‘प्रतिष्ठित’ मीडिया संस्थानो के ऐसे ऐसे वीडियो मिल जायेंगे जिनका मथैला कुछ और ही होगा और भीतर की सामग्री कुछ और ही निकलेगी. पुराने जमाने में भी ऐसी झूठी खबरें छापी जाती थीं पर या तो होली के अवसर पर या पहली अप्रैल को. अब तो हर दिन पहली अप्रैल बन गया है.

आप भी सोच रहे होंगे कि मैं भी तो वैसा ही कर रहा हूं. मथैला दिया बेहया शिरोमणि बनने की कट्टर प्रतियोगिता की और लिख कुछ और ही रहा हूं. तो आइये अब उसी मुद्दे पर लौटते हैँ. देश की राजनीति में आजकल दो बड़े नेताओं के बीच बेहया शिरोमणि बनने की कट्टर प्रतियोगिता चल रही है. मैं उन राजनेताओं का नाम नहीं लेने जा रहा पर उनके प्रशंसक जरुर कहेंगे कि वे इतने बेवकूफ नहीं कि अपने नेता के बारे में गलत टिप्पणी सहन कर जाँय. बिना नाम लिये भी पूरा देश बता देगा कि ये दोनों बेहया शिरोमणि हैँ कौन.

और एक बार आप बेहया बन जाओ फिर देखो तुम से टकराने कोई नहीं आयेगा. बिना लाग लपेट, बिना चेहरे पर कोई शिकन लाये इतने सहज भाव से झूठ बोल जाते हैँ ये दोनों बेहया शिरोमणि कि लाई डिटेक्टर भी नाकारा साबित हो जाय. पोलीग्राफी टेस्ट भी इनके झूठ पकड नहीं पायेगा. और अगर आपको उम्मीद है कि देश की मीडिया इन बेहया शिरोमणिओं के पोल खोल देगी तो जितनी जल्दी आप इस गलतफहमी को दूर कर लें उतना ही अच्छा रहेगा. मीडिया वाले तो कूकूर होते ही हैँ. किसी भी अनजान अपरिचित को अपने इलाके में देख लें तो आसमान सिर पर उठा लेंगे. पर कोई कुत्ता इतना आदमी नहीं होता कि वह उस पर भूंकने लगे जो उनको रोटी दे रहा हो, या दिखा रहा हो.

तो अब तक आप अगर इन बेहया शिरोमणिओं को पहचान गये हों तो कृपया उन तक यह बात जरुर पहुँचा दें कि एक और कुकुर है जिसको आपसे रोटी मिलने की लालसा है. जिस दिन उनसे रोटी मिलनी शुरु हो जायेगी मैं इनके बारे में यही कहूगा कि ‘ बदनाम न होने देंगे तुझे, तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया’.

और हाँ गाहे बगाहे कभी मेरी तरफ भी आ जाया करें तो मुझे खुशी होगी. विश्वास तब भी है कि आप मुझे खुश नही होने देंगे.

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