डाही सुबन्धु

डाही सुबन्धु

jealous subandhu a story from history

– प्रो.(डॉ.) जयकान्त सिंह ‘जय’

#आचार्य-चाणक्य #सुबन्धु #भोजपुरी #जयकान्त-सिंह-जय

आज फेर मंत्री सुबन्धु आचार्य चाणक्य के विरुद्ध सम्राट बिन्दुसार के कान भरत कहलस – “अरे महाराज, हमरा आचार्य से ईर्ष्या-डाह थोड़े बा. जवना बात में सच्चाई बा, हम उहे कहेब. गरदन पर तलवारो रखके झूठ बोले के कहाई त हम झूठ ना बोल सकीं. एह में कवन झूठ बा कि आचार्य रउआ माई महारानी दुर्धरा का भोजन में जहर दिउवाके मरवा देले रहस. एह घटना के के नइखे जानत.”

सुबन्धु के मुँहे एह राज के कई बेर सुन-सुनके सम्राट का उनका एह बात पर भरोसा होखे लागल. सम्राट के भरोसा जीते खातिर सुबन्धु अपना कुछ विश्वासपात्रन से गवाहियो दिउवा देत रहस. अब सम्राट के मन में आचार्य चाणक्य के लेके मान -आदर आ विश्वास-बात कम होखे लागल. एह बात के आचार्य ताड़ लिहलें आ अपना गुप्तचर के माध्यम से सम्राट का मन के बात जान गइलें. आचार्य चाणक्य ई त जानत रहस कि सुबन्धु उनका से जरेला. ऊ ना चाहे जे आचार्य के सम्राट ओकरा आगे अधिका तरजीह देस. बाकिर अइसन अछरंग लगाई, ऊ एकर कल्पनो ना कइले रहस. ऊ त इहो ना सोचले रहस कि जवना बिन्दुसार के ऊ अपना गोदी में खेलवले आ बाहरी-भीतरी कतना संकट से बचवले रहस, ऊ एक दिन एतना मन मोटा कर लिही. फेर ऊ सम्राट बिन्दुसार के बिना बतवले एगो निर्जन बन में एगो छोट कुटिया बनाके तप-साधना करे लगलें. धीरे-धीरे अन्न-जल छोड़े के अभ्यास में लाग गइलें. एने सब जानकारी के बावजूद सम्राट का आचार्य के कमी बहुते खटकत रहे. बाकिर केहू से कुछ कह ना पावत रहस आ सुबन्धु उनका आस-पास हरमेस मेड़राइल रहत रहे कि केहू दोसर मंत्री ओकरा विरूद्ध सम्राट के कान जनि भर दे.

एक दिन सम्राट बिन्दुसार के दासी का अवसर मिल गइल त ऊ उनका से महारानी दुर्धरा का मृत्यु के कुल्ह कथा सुनावे लागल – “हे महाराज, महारानी दुर्धरा के मृत्यु में आचार्य कवनो कसूर ना रहे. भइल ई रहे कि आचार्य चाणक्य महाराज चन्द्रगुप्त मौर्य के लेके हरमेस चिंतित आ चौकन्ना रहत रहस. उनका लागे कि उनका विरुद्ध राजमहल में कबो कवनो धोखाधड़ी हो सकेला. केहू उनका जीवन खातिर खतरा बन सकेला. आउर कुछ ना त उनका भोजन में जहरो दिउवावल जा सकेला. एह से ऊ अपना खास विश्वासपात्र के माध्यम से सम्राट के भोजन में बहुते कम मात्रा में अक्सरहां जहर डलवावत रहस ताकि जहर उनका देह में भीन जाए. मतलब उनका सरीर पर आगे कबो कइसनो जहर के असर जनि होखे. कवनो मुदई उनका भोजन में जहर देवे उनकर हत्या ना करवा सके. बाकिर जब रउरा महारानी दुर्धरा के पेट में रहीं त संजोग से एक बेर सम्राट के ऊ भोजन राउर माई महारानी दुर्धरा कर लिहली आ उनकर स्वास्थ्य बिगड़े लागल. तब आचार्य चाणक्य एक-एक चीज के रउरा पिता सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य आ माई महारानी दुर्धरा से बतवलें. समय हाथ से निकलल जात रहे. तब आचार्य चाणक्य महाराज आ महारानी से कहलें कि दुर्धरा के जीवन संकट में बा. बाकिर हमनीं चाहीं त मगध के भविष्य आ जे दुर्धरा के गर्भ में पल रहल बा, ओकरा के बचावल जा सकत बा. आचार्य के बात सुनके महारानी दुर्धरा मुस्कात कहली – “हे आचार्य, हमरा एह बच्चा के कइसहूं बचा लीं. राउर ई रिन हम कवनो जनम में जरुर चुका देब.” महाराज असमंजस में पड़ल रहस. महारानी महाराज के हाथ दाब के अइसन करे खातिर बाध्य कर दिहली. तब महाराजो महारानी से सहमत हो गइलें. फेर आचार्य चाणक्य कुशल वैद्य के मदद से महारानी के गर्भ से रउआ के बाहर निकलवा के राउर आ मगध का उत्तराधिकारी के रक्छा कइलें. एह से रउरा मतारी महारानी दुर्धरा के मृत्यु के आधा सांच रउरा के बताके आचार्य के प्रति रउरा मन में कटुता पैदा कइल गइल बा.”

दासी के मुँहे कुल्ह सच्चाई जानके सम्राट बिन्दुसार बहुत लज्जित भइलें आ आचार्य चाणक्य के खोज जारी भइल. बाकिर आचार्य चाणक्य आपन कुटिया आ तपस्या छोड़के मगध राजदरबार लौटे से मना कर दिहलें. एकरा बादो सुबन्धु आचार्य के लेके हरमेस आशंकित रहत रहे. फेर ऊ सम्राट बिन्दुसार के सौतेली यूनानी मतारी हेलना कार्नेलिया के सङ्गे मिलके तपस्या करत आचार्य चाणक्य का कुटिया के राति के चारो तरफ से घेर के आग के हवाले कर दिहलस. एह तरह से मंत्री सुबन्धु के ईर्ष्या-डाह आचार्य चाणक्य के जान ले लिहलस.
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प्रो. जयकान्त-सिंह-जय,
विभागाध्यक्ष-स्नातकोत्तर भोजपुरी विभाग, बी. आर. अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर ( बिहार )

पिनकोड-842001
राष्ट्रीय महामंत्री, अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन, पटना ( बिहार )
ई-मेल-indjaikantsinghjai@gmail.com

आवासीय पत्राचार-‘प्रताप भवन ‘महाराणा प्रताप नगर
मार्ग सं. -1( सी ) भिखनपुरा, मुजफ्फरपुर ( बिहार )
पिनकोड-842001

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