– टीम अंजोरिया
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अखबार पत्रिका किताब का बहाने फेसबुकिया चरचा
facebook vs newspapers periodicals books

आजु के मथैला हम खास क के फेसबुके खातिर लिख रहल बानी आ एकरा के फेसबुके पर खास कर के साझा करे के विचार बा। बाकिर दुनिया के भोजपुरी में शुरु भइल पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम-ओ पर एकर मौजूदगी रही। काहे कि अगर मौजूदगी ना रहल त सगरी चरचा निरर्थक हो जाई।
राह-पेड़ा में, हाट-बाजार में, सभा-समारोह में अपना परिचितन से मिलला का बाद भेंट-घाट का साथही कुछ ना कुछ नया-पुरान के चरचो हो जाला। बाकिर का ई सामाजिक हेलमेल ला पर्याप्त होखेला? संबंध गाढ़ होला जब रउरा अपना हित-मात-मीत-घात का साथे औपचारिक मुलाकात करीं। उनुका के अपना इहां बोलाईं, उनुका बोलवला पर भा कबो-कभार बिना बोलवलहूं उनका हियां जाइए के कइल जा सकेला। ह्वाट्सअप पर कतनो पोस्ट साझा कर लीं ओकर ऊ महत्व ना हो सके जवन एक दोसरा का घरे जा के हिरदा साझा कइला पर होखेला।
हमरा अपना भाषा भोजपुरी से माई लेखा नेह होला बाकिर अपना मौसी, बहिन, से अनदेखी कर के ना। सभकर आपन जगहा बा, सभकर आपन महत्व बा। बरीस 2003 में शुरु भइल भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम आजु अनेके बवण्डर चकोह से गुजरला का बादो जिन्दा बावे ई हमार सौभाग्य बा। बाकिर भोजपुरियन के सुभाव का चलते कई बेर दुखो होखेला। खास कर के तब जब भोजपुरी पढ़ेवाला आवसु ना, लिखनिहार लोग आपन लिखलका भेजे ना, जे लोग आइयो जाला ऊ लोग आपन राय-विचार साझा ना करे। आ ऊ सगरी लिखनिहार फेसबुक पर मौजूद रहेलें। उनुकर जमघट लागत रहेला। सभका बुझाला कि हमरा पोस्ट पर हतना लोग के कमेंट आ गइल, हतना लोग हमरा के फॉलो करत बा। बाकिर का कबो अपनहूं दर्शक बनि के देखले बानी?
आ एहिजे बात आवत बा फेसबुक के चरचा अखबार, पत्रिका, आ किताबन से करे के। फेसबुक त टीवी चैनलो से छनिका भर के होखेला। सुननीं चैनल बदलनी आ सभ गायब. लवटि के आइब त खबर बदलल रही, चरचा बदलल रही। यूट्यूब जइसन मंचन पर एकही वीडियो के टुकी-टुकी कर के कई बेर डालल जाला। आ हर बेर मथैला बदलल होला। मकसद होला पोखरा में मछरी पकड़े खातिर तरह-तरह के चारा डालल, तरह तरह के बंसी डालल। का पता कवन मछरी कवन चारा देखि के चलि आवे!
कबो आपन टाइमलाइन बाद में कवनो दोसरा लॉगिन से विजिट कर के देख लीं। रउरा का पोस्ट कइनी ओह ले बेसी ओहन के पोस्ट मिल जाई जे आपन पोस्ट रउरा से साझा कइले बाड़न। रउरा पोस्ट पर कइल टीका-टिप्पणी त स्वागत जोग बा बाकिर दोसरो के पोस्ट रउरा टाइमलाइन पर का करत बा? राउर कतना पोस्ट पर एक दिन बाद, एक हफ्ता बाद, एक महीना बाद, एक साल बाद कतना कमेंट होखत बा? जाने के चहनी कबो? रउरा त बस आपन टटका पोस्ट, आपन फॉलोवरन के गिनिती देखिए के गील हो जानी। बाकिर ई गीलापन कतना देर ले साथे रहे ला रउऱा? तनिके देर बाद कीड़ा कुलबुलाए लागेला, कुछ नया पोस्ट डाले के, केहू के पोस्ट साझा करे के। एगो साँच बात बताईं त आदमी दोसरा के पोस्ट बस इहे सोच के साझा करेला कि इहो हमार पोस्ट साझा करत रहेला। ई हमरा के अपना सभा-समारोहन में पुरस्कृत सम्मानित करत रहेला त हमरो चाहीं कि एकरा के अपना सभा समारोह में बोला के एकरा के सम्मानित करीं, पुरस्कार दीं। ‘तू हमरा ओरि ताकऽ हम तोहरा ओरि ताकब’ के भाव रहेला। ना त मन से केहू के प्रशंसा करत बहुत कमे लोग के देखले बानी। पत्रिकनों में लोग आपन लिखलका देखि लेला, ओकरा के प्रचारित कर देला बाकिर ओकरा लगे फुरसत ना होखे कि दोसरो के लिखलका पढ़ के देखीं कि ऊ का लिखले बा, कइसन लिखले बा।
तीन दिन ले भाई रोई, पाँच दिन ले माई/तेरह दिन ले तिरिया रोई केहू साथ ना जाई।
अखबार के छपलका कुछ दिन ला, पत्रिकन में छपलका बहुते दिन ला आ किताब त हमेशा खातिर होखेला. ठीक एही तरह फेसबुक पर लिखलका कुछ घंटा ला, अखबारन के कुछ दिन ला। पत्रिकन में छपलका ओकरा अगिला अंक तकले आ ओकरा बादो ला, आ किताब त हमेशा ला होखेला।
अलग बाति बा कि हर केहू आपन किताब ना छपवा सके, हर केहू के रचना पत्रिका में छप ना पावे छपे जोग होखला का बावजूद, आ अखबारो में दैनिक भा साप्ताहिक स्तम्भ लिखे के सौभाग्य सभका ना मिल पावे। एह सभ ला योग्यता का साथही संपादक-प्रकाशको से संपर्क होखल जरुरी होला। अलगा बात बा कि रउरा से बड़का लिखनिहार रउरा के ना चीन्हे, अपना से छोटका लिखनिहारन के रउरा ना चीन्हीं। आ रउरा बरोबरी के लिखनिहार रउरा कमे मिलिहें काहे कि रउरा उनुका के अपना बरोबरी के भलहीं मान लीं, ऊ मनिहें तब नू!
अंजोरिया पर आजु तक ले सैकड़ो लिखनिहारन के रचना अंजोर हो चुकल बा बाकिर उहो लोग आपन नया रचना सीधे अंजोरिया के ना भेजे। फालतू के वेबसाइट पर काहे भेजे भला। हम ना तीन में बानी ना तेरह में, हम ना त दलित साहित्यकारन के चरचा करेनी, ना पिछड़ा साहित्यकारन के, ना सवर्ण साहित्यकारन के। हमरा ला सभे बरोबर होला। सभकर स्वागत करेनी। आजु ले इयाद नइखे कि केहू आपन लिखलका भेजले होखो आ हम ओकरा के अजोर ना कइले होखीं। बाकिर उहो लोग चिरौरी करावल चाहेला कि हम दस बेर चिरौरी करीं, बीस बेर उनुका के ह्वाट्सअप करीं! गलती से कुछ लोग पढ़े चलि आवेला त ओकरा अपना मन के सामग्री ना मिले। गूगल बतावेला कि अंजोरिया पर सबसे बेसी लोग होठलाली देखे-सुने आवेला। बाकी लेखन, कहानियन पर, चरचन पर केहू के मन ना करे आवे के । भूले-बिसरे गलती से आइयो जाला त आपन कमेंट दिहल ओकरा शान का खिलाफ होखेला। ना चाहे कि दोसर लोग जानो कि उहो अंजोरिया पड़े आवेला। रउरो शायद ओही में शामिल बानी का ?
अब हम अंजोरिया ला आपन राय विचार लिखलका भेजे ला एगो समर्पित ई मेल बना दिहले बानी – anjoria@rediffmail.com जवना पर रउरा आपन राय लेखनी साझा कर सकेनी। बाकिर हमरा पूरा भरोसा बा कि रउरा गलतियो से मेल ना लिखब, ना भेजब। से हमहूं ‘मन की बात’ शैली में आपन कह दिहनी एही भरोसे कि रउरा एकर जबाब ना देब। हम सही बानी कि ना से त समय बताई। अब ऊ समय हमार समय पूरा भइला का पहिले आवत बा कि ओकरा बाद, ई भगवान जानसु।

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