आइल भोजपुरिया चिट्ठी -38
जब भागि में रही त, केहूँ के रोकले ना रोकाई

आजु फेरु लभेरन दुपहरिया में काकी किहाँ पहुँचले। काकी चिंता में रहली कि का भइल, अइसे त कबो देर ना करेले लभेरन। बाकिर पहुँचते लभेरन आपन बात बतवले कि पड़ोस का मिसिर जी किहाँ तिलकहरू आ गइल रहन सन आ ऊ हमरा परिचय के निकलि गइले सन। अब ओहिजा हमार रहल जरूरी रहल हा। एही में देर हो गइल हा, काहेंकि खाना ओना खिआइए के उहन लोग के बिदाई कइल गइल हा। सुनि के काकी का जान में जान आइल।
लभेरन जब ओहिजा पहुँचले त कर्म आ भागि पर बहस चलत रहे। दूनो नतिया भाग्य के बात माने खातिर तेआरे ना रहन स आ खदेरन अहिर बार-बार तुलसी बाबा के एकहीं चउपाई के पराँचत रहन- “होइहें सोइ जो राम रचि राखा।” जब भागि में रही त, केहूँ के रोकले ना रोकाई।
लभेरन के मोहल्ला का पढ़ल-लिखल लोगन में गिनती होत रहे। काकी कहली कि अब तूहीं फरियाव लभेरन कि सबसे बड़ का हटे, कर्म कि भागि? केकरा पक्ष में बुद्धिमान लोग रहेले? लभेरन आपन बात कहे शुरू कइले।
करम आ भागि त भागिए के नु कहल जाला? रहल कर्म आ भागि में अंतर के बात त ओह पर बहुत विचार करे के परी। लभेरन बोले शुरू कइले।
बहुत आसान नइखे काकी, केहू के कम आ केहू के अधिका बतावल। अब रउएँ बताईं, लोक में एह भजन का बिरोध में केहू बोलेला- “राम ना बिगरिहें जेकर, केहूँ ना बिगारी जी?” त ई का भइल? प्रकारांतर से भागिए के नू महातम भइल? एहिजा राम ‘भागि लिखेवाला’ का रूप में आइल बाड़े। रामचरितमानस का बालकांड में तुलसीदास लिखतारे-
होइहें सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तरक बढ़ावै साखा।
माने साफ बा कि भागि में जवन लिखल होई, ऊहे होई। आ ऊहे अयोध्याकांड में लिखतारे –
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
माने, जइसन करबऽ, ओइसने फल मिली। एहिजा कर्म के महत्त्व दिहल जात बा।
काकी कहली- तूँ त अझुरा दिहल। एकरा के तनी अउरी साफ करऽ।
लभेरन कहले कि बालकांड में ‘होइहें सोइ जो राम रचि राखा‘ भगवान शंकर जी कहले बानी आ ऊहो तब, जब उहाँका अपना ओरि से कवनो उठाइ ना रखलीं सती जी के समुझावे खातिर। बाकिर अंत अंत तक सती जी उहाँका बात पर बिसवास ना कइलीं, जबकि उहाँका शिवजी के भगवान मानत रहलीं। अंत में शिवजी के बुझा गइल कि हमार प्रयत्न अब व्यर्थ बा, जवन बरम्हा जी उनका लिलार में टँकले होइहें, ऊहे होई।
‘करम प्रधान बिस्व करि राखा’ अयोध्या कांड में आइल बा। ई बात लक्ष्मण जी कहले बाड़े। जब श्रीराम, माता सीता आ लक्ष्मण वनवास खातिर निकललन, त ऊ लोग शृंगवेरपुर पहुँचल। ओहिजा निषादराज गुह ऊहन लोग के सेवा कइले। जब निषादराज देखले कि जवन राम-सीता महल का कोमल बिस्तर पर सूतत रहन, ऊ आजु जमीन पर सूतल बाड़े, त उनुकर मन बहुत दुखी हो गइल। ऊ भावुक होके लक्ष्मण जी से कैकेयी के शिकाइति करे लगले। तब लक्ष्मण जी उनुका के ज्ञान के उपदेश दिहले- हे भाई! ना केहूँ केहूँ के सुख देला नु दुख, सभ अपने कइल कर्म के फल भोगेला। ईश्वर सम हवें, ऊ ना केहूँ से प्रेम करेलन नु द्वेष। ऊ संसार के कर्मप्रधान बनवले बाड़े, एहिजा जे जइसन करी, ओइसने फल पाई। एहिजा ‘करम’ के मतलब खाली शारीरिक क्रिया नइखे, बलुक ई कर्म आ प्रारब्ध (भाग्य) के अंतर्संबंध के देखावता। लक्ष्मण जी जब कहतानी कि “जो जस करइ सो तस फलु चाखा”, त एकर मतलब ई भइल कि रउआँ जवन फल चीखतानी (जेकरा के हमनी का भाग्य कहींले जा), ऊ वास्तव में रउरे कवनो ‘करम’ के परिणाम हटे।
अतना पर काकी कहली कि एकर मतलब त ई भइल कि कर्म आ भाग्य एके हटे। एकरा के तनी अउरी खुलि के समुझाव। लभेरन फेरु बोले शुरू कइले।
कर्म तीन तरह के होला- संचित, प्रारब्ध आ क्रियमाण। एकरा के बैंक अकाउंट का उदाहरण से समुझल जा सकत बा।
‘संचित’ (Fixed Deposit/Total Balance)- मानि लीं कि रउरा बैंक खाता में 60 लाख रुपया जमा बा। ई राउर पूरा कमाई हटे, जवन बरिसन से जमा भइल बा। ई ‘संचित’ हटे। ई चुपचाप परल बा, एकरा से रउरा कवनो फरक नइखे परे के।
प्रारब्ध (Monthly Salary/Budget)- बैंक से काटिके रउरा हाथ में एह महीने का खर्च खातिर जवन 60 हजार रुपया आवता, ऊ ‘प्रारब्ध’ हटे। अब एही 60 हजार में अपने के सुख आ दुख (खर्च अउर बचत) के अनुभव करे के बा। एकरे के भाग्य कहल जाला।
‘क्रियमाण’- अब भोग भा खर्च रउरा करे के बा, जइसे करीं। नीमन भा बाउर राउर कइल ईहे कर्म ‘क्रियमाण’ हटे।
“माने ‘संचित’ पुरान कर्मन के स्टॉक हटे, ‘प्रारब्ध’ फलित हटे, एकरा के भोगहीं के परेला। एकरे के भाग्य कहल जाला। ‘क्रियमाण’ वर्तमान हटे, जवन पूरी तरह हमनी का हाथ में बा, जवन हमनी का कर रहल बानी जा।”
अब जाके काकी के संतोष भइल।
—————-

संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


0 Comments