लड़ाकिन आ कबाकिन – बतकुच्चन-231
- टीम अंजोरिया

लड़ाकिन आ कबाकिन – बतकुच्चन-231

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भाषा के मर्यादा आ मर्यादित के भाषा दुनु एके होला कि अलग अलग? आदमी के चाहीं कि ऊ भाषा के मर्यादा राखो आ कि मर्यादित के भाषा बोलो ?

बतकुच्चन लिखत में ध्यान राखे के कोशिश करीलें कि भाषा के मर्यादा के धेयान राखीं। बाकिर कई बेर मर्यादित के भाषा में ऊ कहल ना जा सके जवन रउरा कहल चाहत होखीं।

रउरा हमरा सुभाव से परिचित बानी कि बेसी यूट्यूब देखला का चलते हमार मथैला उटपटांग बन जाला। भीतर के कहनाम जवन होखो शुरुआत के एकाधे सेकेण्ड मिलेला जब पाठक-पाठिका के हूक कइल जा सके। ई हूक भोजपुरी वाला हूक ना होके अंगरेजी वाला हूक हवे। जइसे मछरी फंसावे वाला बंसी के हूक होला वइसने हूक। आ मथैला ओह हूक का ऊपर फँसावल चारा होखेला जवना के देख के मछरी ललचा जाव आ मुँह मार देव बंसी पर। मथैलो के मकसद इहे होला कि रउरा पहिलका लाइन पढ़ते पढ़ल शुरु कर दीं। अगर मथैला कामयाब ना बनल तब रउरा देख के आगे बढ़ जाएब बिना पढ़ले।

त आजु के हूक कामे आ गइल आ रउरा पढ़ल शुरु कर दिहनी। अब पूछब कि लड़ाकिने आ कबाकिने काहें? लड़ाको आ कबाको त कहल जा सकत रहुवे। बात सही बा। बाकिर हमरा लागेला कि कबाक का मुकाबिल कबाकिन बेसी मिल जालीं सँ। दोसर कारण ई रहल कि चुनाव के एह माहौल में कवनो राजनीतिक चरचा करल चाहत रहीं। नेतवन के आदत होला कि अपना विरोधी गोल के नाम बिगाड़ के कुछ अइसन कह सको जवन ओकरा पर चस्पा हो जाव। त टीएमसी के विरोधी ओकरा के कवन नाम दीहें? ई सोचे चलनी त जवन पहिलका जबाब हमरा सूझल तवन मर्यादित के भाषा ना बुझाईल। हालांकि भाषा के मतलबे होला कि जवना उद्गार के बोलेवाला आ सुनेवाला दुनु समझ सको। ई सांकेतिक हो सकेला आ शाब्दिको। लिखत-पढ़त में सांकेतिक भाषा के ठीक से समुझावल ना जा सके। त रउरो सोच लिहले होखब कि टीएमसी के पूरा नाम का हो सकेला बाकिर फेर रउरो लागल होखी कि ई गाली-गलौज के भाषा ठीक ना रही। त रउरा ओकरा के टीएमसी ए कहि के निपटा दिहल चाहब जइसे कि जीपीएल से निपटा दिहल जाला। जीपीएल तब प्रचलन में आइल रहल जब आआपा से योगेन्द्र ना सलीम यादव के जीपीएल मार के गोल से बाहर फेंकल गइल रहल। टीएमसी के राजनीतिक भाषा में तोलाबाज मुस्लिम कांग्रेस कहल जा सकेला। ई मर्यादित के भाषा त हो सकेला बाकिर भाषा के मर्यादा राखत बा कि ना ई हर आदमी अपना तरीका से ली। एहसे हमहूं एह सब से किनारा कर लीहल चहनी आ तब दिमाग में आ गइल एगो लड़ाकिन कहाए वाला कबाकिन के छवि।

आ लड़ाकिन कहाए वाला कबाकिन के छवि दिमाग में आवते हमरा एह बतकुच्चन के मसाला मिल गइल। लड़ाकिन रहली झाँसी के रानी लक्ष्मीबाई। जे अपना हक के लड़ाई, अपना देश के लड़ाई लड़ली। गलत का खिलाफ लड़े वाला लड़ाका आ लड़ाकिन दुनु का साथे आम आदमी खड़ा हो जाला बाकिर कबाक भा कबाकिन अलगे प्रजाति के होलन। कबाक आ कबाकिन खोज-खोज के लड़े के बहाना खोजेले। इहे काम बयानबाजी से निपटा लेबे के गलथेथरई कहल जाला। आ गलथेथरई करे वाला हर जगहा मिल जालें। हो सकेला कि रउरो हमार बतकुच्चन गलथेथरई लागो।

रउरो सोचत होखब कि ई कबाक शब्द आइल कहाँ से? हमहूं सोचनी आ गूगल क के देखनी बाकिर कुछ भेंटाइल ना। असल में आम बोलचाल में कई एक शब्द अइसन होलें जवन गलीमोहल्ला में त जम के बोल लीहल जाला बाकिर शब्दकोश में आवे में समय लागेला। भोजपुरी के एगो सुभाव हवे नया नया शब्द गढ़ लेबे के। हर इलाका में एह तरह के शब्द मिल जालें। हमरा इयाद बा कि जब बलिया आइल रहीं त बाजार में मिले वाला प्लास्टिक थैली खातिर झिल्ली के इस्तेमाल सुननी। थैली आ झिल्ली के फरक त सभे जानेला। थैली कपड़ा का दोकान में मिलेला आ झिल्ली सब्जी का दुकान पर।

अब एकही लेख में कतना बतकु्च्चन करीं। से रुकत बानी। रउरा नीक लागल होखो त दोसरा से बताईं कि उहो दुनिया में भोजपुरी के पहिलका वेबसाइट अंजोरिया का बारे में जान जाव। पैतीस करोड़ लोगन में से पैंतीसो हजार अगर ना आवे, ना जाने त का फायदा ! बाकिर भोजपुरियन के तुलना कई बेर केंकड़न से क दीहल जाला। केंकड़ा के आराम से छईंटी में राख दीहल जाला। अगर कवनो केंकड़ा निकलल चाही त सौ गो केंकड़ा ओकर टाँग खींचे में लाग जालें। रउऱा भोजपुरी से कतनो प्रेम होखो ई बर्दाश्त ना होखी कि कवनो दोसर भोजपुरिया रउरा से आगा निकल जाव। से जानत बानीं कि रउऱा दोसरा से एकर चरचा ना करब। रउरा से एह तरह के उमेदो राखल बेकार रहे वाला बा। रउऱा अतना ले पढ़ल जारी रखनी एहला राउर अभिनन्दन।

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