श्रेणी: भाषा

भाषा, मातृभाषा आ भोजपुरी

पाती के सितम्बर २०१२ अंक प्रकाशित भइल. डाउनलोड कर के पूरा पत्रिका पढ़ीं. – डा॰ अशोक द्विवेदी भाषा ऊ हऽ जवन समय से उपजल परिस्थितियन में- हमहन के जिये आ अपना जरूरतन खातिर, एक दूसरा से मिले-जुले, बोले बतियावे लायक बनावेले, जवन...

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बतकुच्चन – ८०

ना अँवटब, ना पवढ़ब, ना दही जमाएब. दूधवे उठा के पी जाएब, एके ओरहन रही. बात सही बा. रोज रोज के तकरार, ओरहन, तंज से तंग आ के कवनो चाकर, कवनो सरकार, कवनो भतार एह तरह के फैसला कर सकेला. अब एह पर चँउके के कवनो जरूरत नइखे कि भतार शब्द...

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बतकुच्चन ‍ – ७९

चोट त चोट ह आ कचोट? कचोट के कम चोट समुझे वाला के बुड़बके बुझे के पड़ी. काहे कि कचोट झलके ना भितरे भितर चोट मारत रहेला. देह के चोट त देर सबेर भुलाइओ सकेला आदमी बाकिर मन के चोट, कचोट, भुलावल बहुते मुश्किल होला. आजु जब लिखे बइठल बानी...

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अंगरेजन का समय में त भोजपुरी के सम्मान मिलत लउकल बाकिर….

अंगरेजन का समय में त भोजपुरी के सम्मान मिलत लउकल बाकिर आजादी के बाद से एकर दसा ढंङ से गड़बड़ाइल ह. गोरखपुर में भोजपुरी संगम के इकतिसवीं बइठकी के अध्यक्षता करत ई बाति डा॰ आद्या प्रसाद द्विवेदी जी कहलीं. उहाँ के एगो उदाहरन देत...

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बतकुच्चन ‍ – ७८

ठाँवे-ठाँवे ठठ के ठठ लोग दोसरा के ठोकत-ठेठावत ठाँय-ठाँय करत ठाँव नइखे लेबे देत. संजोग बा दुर्योग से ओहू ठठ के नेता ठए धातु के हउवन स. अब ठए से ठठेरो होला, ठए से ठाकरे आ ठाकुरो होला. ठाकुर के कवनो खास जात ना होखे. बाभनो ठाकुर...

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