श्रेणी: साहित्य

बतकुच्चन – ४१

पिछला दिने खूब बतकही सुने के मिलल आ हम बतरस लेत रहनी. बाकिर बतकही का दौरान बाताबाती आ गलथेथीओ सुने के खूब मिलल. त सोचनी काहे ना आजु बाते पर बतकुच्चन कइल जाव. बतकुच्चन करे वाला जरूरी नइखे कि बतबनवो होखे. बतकुच्चन करे आ गलथेथी करे...

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बतकुच्चन – ४०

जेकरा खातिर चोरी कइनी उहे कहलसि चोर. पता ना सबले पहिले ई बाति के कहले रहुवे बाकिर आदिकवि वाल्मिकी का बारे में कहल जाला कि ऊ पहिले डकैत रहलन आ लूट मार क के परिवार चलावत रहले. बाद में जब पता चलल कि उनुकर परिवार उनुका पाप के...

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लोक कवि अब गाते नहीं – १५

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) चउदहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि गोपाल पंडित के बेटी के बिआह खातिर लोक कवि रुपिया त दे अइलन बाकिर बिआह ठीक ना हो पावल. सिरिफ पइसा भर से केहु के शादी ब्याह तय...

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पेंचर पहुना

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” कल्हिए रमेसर काका एगो टाली के परची दे गइल रहुअन. ऊँखी छिलवावे के रहुए ए से आजु सबेरवें ऊँखी छिलवावे खातिर पूरा गाँव की लोग के चला के हमहुँ ऊँखियारी में चलि गउँवीं. रउआँ सभें त जानते बानी की...

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बतकुच्चन – ३९

कहल जाला कि तुलसीदास लिख गइल बानी कि “कूदे फाने तूड़े तान, वाके दुनिया राखे मान”. तुलसीदास का जमाना में लोकतंत्र त रहे ना बाकिर उनुका अन्दाजा रहे कि कलियुग में का होखे जा रहल बा आ आवे वाला दिन में दुनिया केकर बाति...

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