श्रेणी: साहित्य

पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 2

दखल नया बदलाव क इतिहास रचे वाला साल के विदाई ! – ‍प्रगत द्विवेदी नया साल के खुशमिजाज सलाम का साथे, बीतल बरिस के खटमिठ अनुभवन क इयाद आइल. नवका सत्र के, नया ‘सनेस‘ में हमके इहे बुझाइल कि हमहन के देश तमाम तरह के संकटन से...

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पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से -1

(हमार पन्ना) [एक] ‘भ्रष्टाचार’ पर राजनीति आ लोकतंत्र के ‘लोकपाल’ सर्वव्यापी राजनीति के पहुँच आ पइसार हर जगह बा त हमनी के जीवन क जरूरी हिस्सा बनल भ्रष्टाचार भला काहें अछूता रही? राजनीति में भ्रष्टाचार आ भ्रष्टाचार पर राजनीति अब...

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बतकुच्चन – ४३

महुआ बीनत लछमिनिया के देखनी, हर जोतत महिपाल, टिकठी चढ़ल अमर के देखनी, सबले नीमन ठठपाल ! नाम कई बेर सार्थक ना हो पावे आ नामित आदमी भा संस्था भा चीझु नाम का हिसाब से ना चलि पावे. बाकिर एकर मतलब इहो ना होला कि नाम हमेशा गलते होखेला....

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लोक कवि अब गाते नहीं – १६

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) पन्दरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे गणेश तिवारी झूठ के साँच आ साँच के झूठ बनावे का तिकड़म में लागल रहेले. अबकी उनुका तिकड़म के माध्यम बनल बा पोलादन जे आपन...

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बतकुच्चन – ४२

बतकुच्चन करत हमेशा याद रहेला कि बाते से आदमी पान खाला आ बाते से लात. अब बाति आ लात के अतना घन संबंध देखला का बावजूद बतकुच्चन के लति धरा गइल बा आ लति धरा जाव त फेर आदमी परिणाम के फिकिर छोड़ देला. हालांकि जरूरी नइखे कि लति हमेशा...

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