गीत
– डा॰अशोक द्विवेदी रतिया झरेले जलबुनिया फजीरे बनि झालर, झरे फेरु उतरले भुइयाँ किरिनिया सरेहिया में मोती चरे ! सिहरेला तन, मन बिहरे बेयरिया से पात हिले रात सितिया नहाइल कलियन क, रहि-रहि ओठ खुले फेरू पंखुरिन अँटकल पनिया चुवत...
Read Moreआजु दू अक्टूबर ह, गांधी बाबा आ लालबहादुर शास्त्री के जन्मदिन. दुनु सादगी से भरल. संजोग से आजु दुर्गापूजा के नवराति के छठवाँ दिन ह. एह धूमधाम, उत्साह, उछाह भरल मौका पर सोचत बानी कि काहे ना व्रत, उत्सव, तेहवार, पर्व तकले अपना के...
Read Moreआजु जब बतकुच्चन करे बइठनी त मन सरोकार-सरकार-सरकँवासी से सरकत गझिन आ फाँफर पर आ के अटक गइल. सरोकार-सरकार-सरकँवासी पर पहिले बतिया चुकल बानी आ ओकरा के दोहरवला के कवनो जरुरतो नइखे. बाकिर गझिन आ फाँफर के चरचा समय का हिसाबो से फिट...
Read More– डा॰अशोक द्विवेदी गोहिया मार चाहे सटहा के होखे चाहे जहर बुझल बात के मार से पीठि पर उखड़ल गोहिया त लउकेला बाकि मन पर परल करिया रेघारी भा अन्तर में उखड़ल गोहिया ना लउके ना लउके दुर्दिन आ दुर्भाग में लागल गहिर ठेस. बोझा बोझा...
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