Category: साहित्य

बतकुच्चन – ३४

आजु जब लिखे बइठल बानी त छठ व्रत के परसाद सामने आ खरना शब्द दिमाग में बा. खरना मतलब खरो ना, कवनो तिनको ना. अइसन उपवास. बाकिर खर दुष्टो के कहल जाला. आ आखर कहल जाला उबड़ खाबड़ भा रगड़त चीझ के. अब सोचीं कि खर, खरना, आखर में कवन संबंध...

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बतकुच्चन – ३३

बोले वाला बोलता आ चुप रहे वाला चुप्पा कहाला. बाकिर चुप्पा अतना आसान ना होले. कई बेर त ऊ चुप्पा शैतान होला. ढेला मार के निर्दोस जइसन चुप्पा मार के बइठल शैतान पर जल्दी केहू शको ना करे आ उ भितरे भीतर मुसुकात सब कुछ देखत रहेला....

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लोक कवि अब गाते नहीं – १४

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) तेरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे लोक कवि के भतीजा एड्स के शिकार हो गइल रहुवे. रोजी रोटी कमाए परदेस गइल आदमी कइसे छन भर के आनन्द खातिर भर जिनिगी के दुख...

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बतकुच्चन – ३२

एने कई दिन से अपना बिधुनाइल मन का चलते कुछ लिख ना पवले रहीं बाकिर काल्हु जब एक आदमी के धुनाइल देखनी त बतबनवा मन में बतकूच्चन होखे लागल. याद आवे लागल कुछ भोजपुरी कहाउत. बाते से आदमी पान खाला आ बाते से लात. एगो दोसर कहाउत ह बड़ जीव...

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बतकुच्चन – ३१

आजु जब बतकुच्चन लिखे बइठनी त सोचले रहीं कि आजु तेहो आ तेहा वाली बाति के तहियाएब जहाँ पिछला हफ्ता छोड़ले रहनी. तले चालू टीवी से कान में आवाज आइल कुछ तेहो लोग के, जे एह बाति पर तेहाइल बा कि देश में दोसरा केहू के महात्मा काहे कहल जा...

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