दू गो गजल
– रामरक्षा मिश्र विमल 1 शहर में घीव के दीया जराता रोज कुछ दिन से सपन के धान आ गेहूँ बोआता जोग कुछ दिन से जहाँ सूई ढुकल ना खूब हुमचल लोग बरिसन ले ढुकावल जात बाटे फार ओहिजा रोज कुछ दिन से छिहत्तर बेर जुठियवलसि बकरिया पोखरा...
Read Moreआजु जब हम ई लिख रहल बानी त मन बहुते अँउजाइल बा. तीन दिन से कुछ काम नइखे हो पावत. सगरी धेयान ओहिजा लागल बा जहवाँ दू गो पक्ष एह तरह से लड़त बा कि “बतिया पंचे के रही बाकिर खूंटवा रहिये पे रही”. केहू दोसरा के सुनल नइखे...
Read Moreका होई जब राउर टहलुआ रउरे के टहलावे लागे ? टहलुआ ऊ जे टहल करे, सेवा करे, राउर छोट मोट काम रउरा कहला पर कइल करे. टहलुआ के स्त्रीलिंग टहलनी होला. सेवा टहल करे खातिर जनता अपना सांसद विधायकन के चुनेले बाकिर चुनाते ऊ लोग चुने वालन के...
Read More(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) एगरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं गाँवे से लवटि के लखनऊ चहँपलो पर लोक कवि के शानदार स्वागत भइल. सम्मान मिलला का बाद लोक कवि के भाव अउरियो बढ़ि गइल रहे आ लोक कवि के...
Read Moreपिछला पखवारे राजनीतिक हिसाब से बहुते हंगामेदार रहल. एह बीच कुछ लोग माल सरका के सरकार से सरकि लिहले त कुछ लोग अपना सरकावे का काबिलियत का चलते सरकार में घुसे के हिसाब किताब लगावे में लागल रहले. अलग बाति बा कि उनकर चलल ना. अब सरकल...
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