Category: साहित्य

बतकुच्चन – २८

प्रकृति के एगो नियम विज्ञान में पढ़ावल जाला कि ऊ गँवे गँवे सब कुछ के समतल सपाट करे में लागल रहेले, चाहे ऊ पहाड़ होखे भा कवनो झील पोखरा गड़हा. अलग बाति बा कि पता ना का होई जब सब कुछ समतल हो चुकल रही. शायद तब धरती पर पानी के प्रलय आ...

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बतकुच्चन – २७

बतबनवा के बतकुच्चन कइल दोसर बाति ह आ घुरचियाह के घुरपेंच बतियावल दोसर. बतकुच्चन करे वाला बाते बात में सामने वाला के कुछ बता देबे के कोशिश करेला. जबकि घुरचियाह आदमी प्रपंची होला आ ओकर घुरपेंच बतियवला के पीछे ओकरा नियत के खोट होला...

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बतकुच्चन – २६

मानत बानी कि बरसात के मौसम बा. कहीं कम त कहीं बेसी बरखा पड़त बा. बाकिर एकर मतलब ई त ना भइल कि सड़कि के कादो पाँकि हँचाड़ खोभाड़ि के चरचा हम सबेरे सबेरे शुरु कर दीं. आखिर हर बाति के एगो आपन समय होला. लेकिन देखत बानी कि बतकुच्चन करे...

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दू गो गजल

– रामरक्षा मिश्र विमल 1 शहर में घीव के दीया जराता रोज कुछ दिन से सपन के धान आ गेहूँ बोआता जोग कुछ दिन से जहाँ सूई ढुकल ना खूब हुमचल लोग बरिसन ले ढुकावल जात बाटे फार ओहिजा रोज कुछ दिन से छिहत्तर बेर जुठियवलसि बकरिया पोखरा...

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बतकुच्चन – २५

आजु जब हम ई लिख रहल बानी त मन बहुते अँउजाइल बा. तीन दिन से कुछ काम नइखे हो पावत. सगरी धेयान ओहिजा लागल बा जहवाँ दू गो पक्ष एह तरह से लड़त बा कि “बतिया पंचे के रही बाकिर खूंटवा रहिये पे रही”. केहू दोसरा के सुनल नइखे...

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