कुछ कविता
– दिलीप पाण्डेय (1) आसरा के बादल बरखे वाला बादल सगरी छाइल खिल गइल चेहरा मुरझाइल अब ना कहीं सुखार होई घर घर में बहार होई बंद जुबानो अब बोली अभागनो के उठी डोली वृद्ध नयन का बावे आस संकट अब ना आई पास झंझट से चेहरा रहे झुराइल...
Read More– शशि प्रेमदेव ना सनेहि के छाँव, न ममता के आँचर बा गाँव में! का जाई उहवाँ केहू अब, का बाँचल बा गाँव में? छितिर बितिर पुरुखन के थाती, बाग-बगइचा, खपड़इला! खरिहानी में जगहे-जगहा जीव जनावर के मइला! ना कजरी के गूँज, ना फगुआ के...
Read Moreबलिया का श्रीराम विहार काॅलोनी में स्थित ‘पाती’ कार्यालय में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बलिया ईकाई का तरफ से आयोजित एगो कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से निराला पुरस्कार से सम्मानित आ भोजपुरी अउर हिन्दी के...
Read More– देवेन्द्र कुमार सउंसे घर में कोहराम मच गइल. सुमना के बाबा के मिजाज राति खानि एकाएक खराब हो गइल. सभे लोगन के चेहरा प हवाई उड़त रहे. अब का होई? अतना राति के ऊहां के अस्पताल ले जाए के परी. काहेंकि एह घड़ी तो कवनो डाक्टर...
Read MorePosted by Editor | Nov 28, 2014 | पुस्तक चर्चा, भाषा, सरोकार |
बावन पेज के पत्रिका, चार पेज विज्ञापन के, चार पेज संपादकीय सामग्री, बाँचल चउवालीस पेज. तरह तरह के तेरह गो संपादक बाकिर प्रूफ आ भाषा के गलतियन के भरमार का बीच भोजपुरी पंचायत पत्रिका के दिसम्बर 14 वाला अंक में भोजपुरी में मिलल...
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