भरपेट भोजन
– विनोद द्विवेदी सड़क का किनारे बान्हल बकरन के झुण्ड में कुछ बकरा बीमार आ उदास लागत रहलन स. एगो बकरा दूइए दिन पहिले खरीद के आइल रहे. उपास खड़ा दोसरा बकरा का तरफ देख के जइसे कहल चाहत रहे कि ना जाने कवना घड़ी में हमार जनम...
Read More– विनोद द्विवेदी सड़क का किनारे बान्हल बकरन के झुण्ड में कुछ बकरा बीमार आ उदास लागत रहलन स. एगो बकरा दूइए दिन पहिले खरीद के आइल रहे. उपास खड़ा दोसरा बकरा का तरफ देख के जइसे कहल चाहत रहे कि ना जाने कवना घड़ी में हमार जनम...
Read More– डॉ. कमल किशोर सिंह हम रटीला रोजे ‘हिपोक्रेटिस’ हृदय में, धरि ‘धनवंतरी’ ध्यान, हम रटी ला रोजे रोगान शेषान, रोगान शेषान. छछनावे, तडपावे, फेर दुहि लेला प्राण, बचल ना केहू – चाहे बच्चा, बुढ़,...
Read MorePosted by Editor | Oct 27, 2014 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
– – ओमप्रकाश सिंह आजुए ईमेल से मिलल भोजपुरी पंचायत पत्रिका के नवम्बर 2014 अंक देखि के मन मिजाज खुश हो गइल. अगर भोजपुरी से छोह के बात हटा दिहल जाव त पत्रिका के कलेवर बहुते स्तरीय बा. सोना पर सोहागा वाला बाति होखीत अगर...
Read More– मनोज श्रीवास्तव केहू के जब आपन खाली घर-दुआर आ आपन गाँव जवार छुटेला त मन केतना भारी हो जाला आ तब त आपन देसे छुटल रहे. ओह घरी कवनो सुख से केहू आपन घर-दुआर, गाँव-जवार भा देसे छोड़ के परदेस थोड़े गइल रहे लोग. खाली अपना परिवार...
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