श्रेणी: कविता

घूँघट आउर इज्जत

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी   बीच बाजार में उ जब घूँघट उठवनी केतनन के आह निकलल कुछ लोग नतमस्तक भईल केहू केहू खुस भईल बाकि कुछ के आवाज बिला गईल   आँख पथराइल दिनही रात के भान पानी पडल कई घइला काँप गइल रोंआ रोंआ थरहरी हिलल...

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अहजह

– नीमन सिंह बतइब हो हम का करीं….. कइसे करीं कइसे रहीं का खाई का पहिनी ? बतइब हो हम का करीं…. कहवां मूती कहवां हगीं केकरा संगे बात बिचारी बतइब हो हम का करीं….. केहू कहे हई करs केहू कहे हउ करs केहू कहे मउज...

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हे ! नाग देवता पालागी !

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी आस्तीन में पलिहा  बढ़िहs मनही मन परिभाषा गढ़िहs कुछो जमइहा कबों उखरिहा गारी  सीकमभर  उचारिहs हे ! नाग देवता पालागी !   हरदम  तोसे नेह  देवता बसिहा  एही  गेह  देवता नीको नेवर बुझिया भलहीं डसिहा...

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माई अब जोखाए लगली

– रश्मि प्रियदर्शिनी अँगना-दुअरा एक कs देवेले लोग कहेला माई के गोड़िया में चकरघिन्नी बा दुअरा के बंगली से अँगना के रसोई तक चलत रहेले चलत रहेले   परिकरम करे जवन धरती आकास एक दिन उहे गोड़वा टेटाए लागल माई के उमरिया बुझाए...

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बहल गाँव बिलाइल खेती

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी   नइकी शादी छंटल  बहुरिया डिस्को झारत भर दुपहरिया भइया फ्रिज में पानी राखस लुग्गा धोवे  रोज तिसरिया अब मइया न बलाएँ लेती . बहल गाँव बिलाइल खेती .   बइठल दुअरे बब्बा रोवें घरवां दादी बरतन...

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