श्रेणी: कविता

महतारी

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी आजु निकहे बिखियाइल बानी माई बचवन पर नरियात नरियात लयिकवो मुरझा गईलें आँखिन के लोर थम्हात नइखे फेरु अझुराइल नोचब बकोटब खिलखिलात, हंसत, मुस्कियात केतना रंग , केतना रूप . झुंझलात, अकबकात कुछो अभियो...

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आन्हर कुकुर बतासे भूंके

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी टीभी के परिचरिचा देखs अस लागे, गोंइठा घी सोखे। आन्हर कुकुर बतासे भूंके।। मिलत जुलत सभही गरियावत पगुरी करत सभे भरमावत पुतरी नचावत मुँह बिरावत एहनिन के अब मुँह के रोके। आन्हर कुकुर बतासे भूंके।। छऊँक...

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आईं आपन छान्हि छवाईं

– डा. कुमार नवनीत काठ करेजी भईल समईया पल पल बदलत दाव, बिछिलायीं जनि, धरीं थहा के आपन एकहक पाँव। सभ धवते बा, आप न धाईं सगरी सपना बेंचि न आईं मोल न कवनो मोल बिकाला, जहवाँ रहीं इहे सरियाईं आईं आपन छान्हि छवाईं तेजि महलिया...

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आरा गान

– शिवानन्द मिश्र रामजी के प्यारा ह, कृष्ण के दुलारा ह, बाबा विसवामीतर के आंखी के तारा ह। बोले में खारा ह, तनीकी अवारा ह, गंगाजी के धारा के नीछछ किनारा ह। गौतमदुआरा ह, भोज के भंडारा ह, सोन्ह गमकेला जइसे दही में के बारा ह।...

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