– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ पहिल गीत कवन गाईं एह गीतन का गाँव में पाहुन-सन मन रहल लजाइल. धनखेती में फूटल सोना रुपनी बइठल बीनत मोना जाँता से जिनिगी लपटाइल छंद झर रहल घर का कोना पाकड़ का पतइन से चिरइन के शब्द झरल...
– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ मत पूछीं कथा जलम के कुछ कथा गढ़े दीं हमके ई बोलत चलल कबीरा हीरदा से निकलल हीरा. हे माई ! त जनि बोलऽ ऊ दरद कहीं जनि खोलऽ आँखिन का पानी से तू अपना अँचरा के धो लऽ. अपना छप्पर छान्ही में गंगा...
-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फागुन के आसे होखे लहलह बिरवाई. डर ना लागी बाबा के नवकी बकुली से अङना दमकी बबुनी के नन्हकी टिकुली से कनिया पेन्हि बिअहुती कउआ के उचराई. बुढ़वो जोबन राग अलापी ली अङड़ाई चशमो के ऊपर भउजी काजर लगवाई बुनिया...
-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे. धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके जवानी अँजोरिया गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि झूमे सरसो...
– अभयकृष्ण त्रिपाठी पहचान के जरुरत नइखे हम नारी बानी मानी न मानी हर केहु पर भारी बानी || लुट रहल बा अस्मत चारो ओरि, जानत बानी, नारी भइल नारी के दुसमन इहो मानत बानी, कोख मारीं आ सर तान के केतनो चलीं रउआ जग के जनावर से परिचय...
पाठक-पाठिकन के राय विचार प्रतिक्रिया..