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भ्रष्टाचार माने मलाई मारे के परमानेंट सोर्स

– जयंती पांडेय आजु करप्शन के नांव पर उहे लोग हो-हल्ला मचा रहल बा, जेकरा करप्ट होखे के मौका ना मिलल. जसहीं मौका मिली, ऊ आपन ओठ सी लिहें. ई रीति जमाना से स चलि आ रहल बिया. लोग भ्रष्टाचार के विरोध करत समय ई ताक में लागल रहे...

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महँगी बढ़े में सरकार के कवन दोष

– जयंती पांडेय महंगी के बढ़े में सरकार के कवनो दोष नइखे. महंगी के काम हऽ बढ़ल. अगर ऊ ना बढ़ी तऽ केहु ओकरा ना चीन्ही ना पूछी. गांव शहर में रहे वाला हर बेकती आपन एगो पहचान राखेला. महंगी भी इहे रास्ता पर चलेले. महंगी लोगन के...

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लोक कवि अब गाते नहीं – १४

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) तेरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे लोक कवि के भतीजा एड्स के शिकार हो गइल रहुवे. रोजी रोटी कमाए परदेस गइल आदमी कइसे छन भर के आनन्द खातिर भर जिनिगी के दुख...

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अण्णा के मौन व्रत

– जयंती पांडेय अण्णा मौन व्रत ले लिहले बाड़े. एक तरह से दमी साध ले ले बाड़े. काहे कि उन कर संघतिया लोग अलटाय बलाय बोलऽता लोग ओह से कहीं ऊ ना फंस जास. ना बोलिहें ना कौनो बिबाद होई. ई सब देखि के सुनि के बेचैन रामचेला बाबा...

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छब्बीस रुपिया में अमीर हो गइले लस्टमानंद

– जयंती पांडेय जबसे योजना आयोग के मोंटेक भाई ई कहले कि हमरा गांव के लोग 26 रुपिया में अमीर हो जाई तबसे बाबा लस्टमानंद सीना फुला के घूमत रहले लेकिन ई पूजा में जब बजार करे गइले तऽ बुझाइल कि ई तऽ कुछऊ ना हऽ. काहे कि बजार में...

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