गीत Posted by Editor | May 7, 2012 | कविता, साहित्य | (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 23वी प्रस्तुति) – रिपुसूदन श्रीवास्तव जिन्दगी हऽ कि रूई के बादर हवे, एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे. जवना घर में ना पहुँचे किरिन भोर के जवना आँखिन से टूटे ना लर लोर के केकरा असरे... Read More
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