साल: 2013

बतकुच्चन १०६

आजु पता ना काहे मन करत बा कि बिर्हनी के छत्ता खरकोंच दी. काहे कि एने कुछ दिन से मधुमाखी के छत्ता चरचा में आ गइल बा. अब मधुमाखियन के भरभरा के निकल पड़े खातिर अतने बहुत बा. बिना कुछ अउर बोललहू लोग भँभोरे निकल पड़ी बाकिर आजु त कहला...

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महतारी

– केशव मोहन पाण्डेय जोन्हिया काकी पता ना केतना दिन के भइली कि टोला भर के सभे काकीए कहेला. ऊ अपना टूटही पलानी में अकेले अपना बाकी जिनगी से ताल ठोंकेली. उनकर पूत पुरन नवका दुनिया के निकललन. दू-तीन बार पंजाब कमाए गइल रहलन से...

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