श्रेणी: भाषा

कवन खाना खाइल ना जाव? (बतकुच्चन – 183)

पिछला बेर दहल, दहलल, आ दलकल के चरचा पर बात रोकले रहीं आजु ओहिजे से आगा बढ़ल चाहब. बाकिर बचपन के याद आवत बा जब सियालदह लोकल में एगो किताब बेचे वाला बुझउवल बुझा बुझा के आपन किताब बेचत रहे. पूछे कि बताईं कि कवन कवन खाना खाइल ना...

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भोजपुरी लिखे पढ़े के कठिनाई आ काट

– डा॰ प्रकाश उदय भाषा-विज्ञान में जवना के भाषा कहल जाला, तवना में, जवन कहे के होला, जतना आ जइसे, तवन कहा पाइत ततना आ तइसे, त केहू के ‘आने कि’, ‘माने कि’, ‘बूझि जा जे’ भा ‘जानि जाईं...

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14 गो आसान तरीका भोजपुरी मुआवे के

भोजपुरी में बतियाईं मत आ जे बतियावे ओकरा के गँवार बताईं. बचवन के भोजपुरी में बतियावे मत दीं. अंगरेजी में गिटिर पिटिर करीहें स त ढेर आगा जइहें सँ. भोजपुरी के कवनो किताब, पत्रिका ना त खरीदीं ना पढ़े के कोशिश करीं. काहे कि भोजपुरी...

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पाती के चौहत्तरवाँ अंक का बहाने कुछ मन क बात

– अशोक द्विवेदी पत्रिका के 74वाँ अंक रउवा सभ के सामने परोसत हम अपना स्रम के बड़भागी मान रहल बानी जे 1979 से जूझत-जागत, ठोंकत-ठेठावत हमनी का पैंतीसवाँ बरिस में चलि अइली जा। एह यात्रा में, सँग-सँग कुछ डेग चले वाला हर...

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सहकल, बहकल आ डहकल (बतकुच्चन – 182)

सहकल, बहकल आ डहकल के चरचा करे के मन करत बा आजु. काहे कि देश में कुछ लोग के अतना सहका दिहल गइल बा कि ऊ बहकल बन गइल बाड़े आ एह बात के कवनो चिन्ता नइखन करत कि उनकर बेवहार केहू के डहकावतो बा. सहके से सहकत, बहके से बहकत, आ डहके से...

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