गीत
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 23वी प्रस्तुति) – रिपुसूदन श्रीवास्तव जिन्दगी हऽ कि रूई के बादर हवे, एगो ओढ़े बिछावे के चादर हवे. जवना घर में ना पहुँचे किरिन भोर के जवना आँखिन से टूटे ना लर लोर के केकरा असरे...
Read MorePosted by Editor | May 5, 2012 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
जिये-जियावे क सहूर सिखावत अमानुस के मानुस-मूल्य देबे वाली ‘गंगा-तरंगिनी’ ‘गंगा-तरंगिनी’ (काव्य-कथा) अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर. मूल्य – पचास रुपये. प्रथम संस्करण. कवि – रविकेश मिश्र (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक)...
Read Moreजमाना खराब हो गइल बा. कब केकरा कवन बाति बाउर लाग जाई आ ऊ रउरा के कूटे लागी कहल ना जा सके. विदूषक, बतबनवा, लबार, कामेडियन आ कार्टूनिस्टन के पिटाए के अनेसा हमेशा बनल रहेला. हमार मुंह टेढ़ काहे बनवले, चल हम तोर मुँह टेढ़ कर देत बानी....
Read More– हरेन्द्र कुमार पाण्डेय योगेश्वर नाम रखले रहस उनकर मास्टर चाचा जवन कलकाता में पढ़ावत रहस. स्कूल में भरती का समय राउत जी मास्टर साहेब ठीक (!) कइलन युगेश्वर. लेकिन गांव में सबका खातिर उ जिंदगी भर आ मरलो के बाद जुगेसरे रहस....
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