बसन्त फागुन
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से आखिरी प्रस्तुति) – डा॰अशोक द्विवेदी धुन से सुनगुन मिलल बा भँवरन के रंग सातों खिलल तितलियन के लौट आइल चहक, चिरइयन के! फिर बगइचन के मन, मोजरियाइल अउर फसलन के देह गदराइल बन हँसल नदिया के...
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Read MorePosted by Editor | May 5, 2012 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
जिये-जियावे क सहूर सिखावत अमानुस के मानुस-मूल्य देबे वाली ‘गंगा-तरंगिनी’ ‘गंगा-तरंगिनी’ (काव्य-कथा) अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर. मूल्य – पचास रुपये. प्रथम संस्करण. कवि – रविकेश मिश्र (पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक)...
Read Moreजमाना खराब हो गइल बा. कब केकरा कवन बाति बाउर लाग जाई आ ऊ रउरा के कूटे लागी कहल ना जा सके. विदूषक, बतबनवा, लबार, कामेडियन आ कार्टूनिस्टन के पिटाए के अनेसा हमेशा बनल रहेला. हमार मुंह टेढ़ काहे बनवले, चल हम तोर मुँह टेढ़ कर देत बानी....
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