श्रेणी: साहित्य

बतकुच्चन – ५१

फगुआ बीतल चइत आ गइल. फगुआ का दिने निकलल होरिहारन के टोली भर दिन फगुआ गवला का बाद चइता गा के नयका साल के स्वागत कइलन. फगुआ आ चइता दुनु के शुरुआत हमेशा देवी वन्दना से होला. सुमिरिले मतवा, जोड़ीले दुनु हथवा हो रामा/ कण्ठे सुरवा/...

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जानकारी चाहीं

भारत के समाचार पत्र निबंधक के कार्यालय से मिलल जानकारी का हिसाब से देश में भोजपुरी के तैंतीस गो प्रकाशन पंजीकृत बाड़ी सँ. भोजपुरी प्रकाशन के एगो सामूहिक मंच दिलावे खातिर सोचत बानी कि एह सगरी पत्र पत्रिका के प्रकाशक, संपादक आ...

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फागुन के तीन गो गीत

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल एक लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे ! धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके जवानी अँजोरिया गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि...

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मस्त फगुनवा

– ओ.पी. अमृतांशु रंग – अबिरवा लेके गुललवा मस्त फगुनवा आईल बा. केने बाड़ी पुरूवा रानी पछेया बउराईल बा. सरसों फुलाइल, लहराइल बा तीसी, मटर के ढेंढी देखावे बतीसी, झपड़-झपड़ गेहूमा के बालवा कचरी पे लोभाइल बा. मोजरा से रस...

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बतकुच्चन – ५०

पिछला बेर बत्ती जरावे भा चालू करे भा रोशन करे के बाति निकलल रहुवे. आखिर ले कवनो राह ना लउकल कि बत्ती के का कइल जाव. एक हफ्ता ले सोचलो पर कवनो दोसर राह ना भेंटाइल. ले दे के इहे बुझात बा कि बत्ती अबही कुछेक साल ले जरबे करी काहे कि...

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