Category: साहित्य

बतकुच्चन – ११

पिछला हफ्ता गोबर पथार के बात निकलल रहे त अबकी खर पतवार दिमाग में आ गइल बा. खर पतवार का बारे में सोचते दिमाग में खरखर होखे लागल जइसे कि मूंजियानी से गुजरत घरी आवाज निकलेला. अइसने खरखर से संस्कृत के एगो शब्द बनल रहे खर्पर. खर्पर...

Read More

मुस्लिम तुष्टिकरण राष्ट्रहित पर भारी पड़त बा

एगो जायज सवाल उठावल जात बा कि आखिर जिन्ना के मुंबई बंगला भारत सरकार उनका के, भा बाद में उनुका वारिसन के काहे ना लवटवलसि ? का एह चलते कि भारत के बँटवारा का बाद जिन्ना भारत के घोषित दुश्मन हो गइल रहले आ उनकर संपत्ति दुश्मन के...

Read More

ई सब रोग गरीबी के

– डॉ. कमल किशोर सिंह उत्तर टोला बर तर, बईठल चबुतर पर, धनिया ढील हेरवावत रहे, सुबुकत सब सुनावत रहे – कतना दुःख सुनाईं बहिनी ई ना कभी ओराला, आ धमकेला दोसर झट से जसहीं एगो जाला. भादो में भोला के कसहूँ गोडवा गइल छिलाय....

Read More

बतकुच्चन – १०

आजु पता ना काहे मन अँउजाइल बा. लागत बा कि कंठ में कुछ अटकल बा अँउजार जइसन. आ कंठ का भीतर कुछ अटकल होखे त जान पर आफत बनि जाला कबो-कबो. अलगा बाति बा कि कंठ का बाहर लटकल कंठहार औरतन के सुंदरता बढ़ा देला. कंठ गवनई के सुरो के कहल...

Read More

Recent Posts