ओका -बोका
– ओ.पी. अमृतांशु तोर नैना, मोर नैना, मिलके भईले चार. चलऽ खेलल जाई, ओका-बोका नदिया किनार. नदिया के तीरे-तीरे, बहकि बेयरिया. संघे-संघे उड़ी गोरी, तोहरो चुनरिया. हियना के डाढ़े-पाते, झुमिहें बहार, चलऽ...
Read Moreपिछला दिने कोलकाता में केन्द्रीय सचिवालय हिंदी परिषद नयी दिल्ली के कोलकाता ईकाई का तरफ से हरेन्द्र कुमार जी के उनकर बहुचर्चित भोजपुरी उपन्यास “सुनीता सान्याल के डायरी” खातिर स्व॰ बी॰पी॰श्रीवास्तव स्मृति पुरस्कार से...
Read More– नूरैन अंसारी अबकी बार एगो दिया तोहरा याद में जराएब. कलिख अपना मन के ओकरा रौनक से मिटाएब. कुछ ना मिलल नफरत कर के, हो गइनी अकेला. लोर भरल अंखिया से देखनी, हम दुनिया के मेला. छलकत अंखिया के गगरी के, हँसी से सजाएब. अबकी बार...
Read More