Category: साहित्य

फाग गीत २

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फागुन के आसे होखे लहलह बिरवाई. डर ना लागी बाबा के नवकी बकुली से अङना दमकी बबुनी के नन्हकी टिकुली से कनिया पेन्हि बिअहुती कउआ के उचराई. बुढ़वो जोबन राग अलापी ली अङड़ाई चशमो के ऊपर भउजी काजर लगवाई बुनिया...

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फाग गीत १

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे. धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके जवानी अँजोरिया गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि झूमे सरसो...

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फगुआ के सांस्कृतिक रंग में सेंधमारी

-डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल फगुआ कहीं भा होली, ई बसंतोत्सव हउवे. बसंत जब चढ़ जाला त उतरेला कहाँ ? एहीसे त होली के रंगोत्सव के रूप में मनावल जाला. प्रकृतियो हमनी के साथ देले. नु ठंढा नु गर्मी, का मनभावन मौसम होला ! रंगन के महफिल में...

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नारी

– अभयकृष्ण त्रिपाठी पहचान के जरुरत नइखे हम नारी बानी मानी न मानी हर केहु पर भारी बानी || लुट रहल बा अस्मत चारो ओरि, जानत बानी, नारी भइल नारी के दुसमन इहो मानत बानी, कोख मारीं आ सर तान के केतनो चलीं रउआ जग के जनावर से परिचय...

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माङ आ आङन के ङ (बतकुच्चन – १४९)

अब रउरा पतियाईं चाहे मत बाकिर संजोग कुछ अइसन बन जात बा कि पत से पतुरिया के चरचा फेरू पाछा छूटल जात बा. काल्हुए एगो लिखनिहार से बात होखत रहे त उ बात उठा दिहलन ङ के. हिन्दी में ङ के इस्तेमाल खोजले ना भेटाईं. संस्कृत में एकर...

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