गजल
– मनोज भावुक वक्त के ताप सहहीं के बाटे बर्फ से भाप बनहीं के बाटे पाप के केतनो तोपी या ढ़ाँपी एक दिन ओकरा फरहीं के बाटे जवना ‘घर’ में विभीषण जी बानी ओह लंका के जरहीं के बाटे चाँद-सूरज बने के जो मन बा तब त गरहन के सहहीं के...
Read More– मनोज भावुक जिनगी भूलभुलइया हम हेरा जातानी. गलती उनकर बाटे हम घेरा जातानी. उ सरवा निर्लज्ज ह हम डेरा जातानी. ताकत होइहें पत्नी हम डेरा जातानी. हम कोल्हू के गन्ना हम पेरा जातानी. क्रोघ अम्ल हs ‘भावुक’ हम सेरा...
Read More(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) अनइसवाँ कड़ी में वकील साहब का फेर मे फँसल ठकुराइन आ धारा ६०४ वाला किस्सा पढ़ले रहीं. अब ओकरा आगा पढ़ीं….. आ अब एही वर्मा वकील के बेटा अनूप लोक कवि के वीडियो...
Read More– मनोज भावुक (१) सर से हाथ हटा के देखीं , हाथ-पैर चला के देखीं, कुछ ना कुछ रस्ता निकली,बुद्धि के दउरा के देखीं पहिले त उठ्ठीं-जागीं, फिर आलस के कंबल फेकीं मन जरूर फरहर होई, दाढ़ी बाल बनवा के देखीं दूध के धोवल केहू नइखे ,सब...
Read More(१) आजादी के जश्न मनउला के दिन बाटे आज गली गली झंडा फहरउला के दिन बाटे आज जे सीना पर गोली खा के आजादी ले आइल ओ बीरन के गाथा गउला के दिन बाटे आज । सत्तावन में गदर भइल उ घाही मन के पीर रहल जंजीर गुलामी के तोड़ला के उ पहिला...
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