Category: साहित्य

माङ आ आङन के ङ (बतकुच्चन – १४९)

अब रउरा पतियाईं चाहे मत बाकिर संजोग कुछ अइसन बन जात बा कि पत से पतुरिया के चरचा फेरू पाछा छूटल जात बा. काल्हुए एगो लिखनिहार से बात होखत रहे त उ बात उठा दिहलन ङ के. हिन्दी में ङ के इस्तेमाल खोजले ना भेटाईं. संस्कृत में एकर...

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चोख कमाई

– ‍ नीमन सिंह पईसा कमा लेला सभे बाकिर नाम ना कमाला केहू, वइसे त कुकुरो पेट पाल लेला, बाकिर मरला पर ओकरा के पूछे ना केहू. तू तियाग कमा …… भूखे रह के दोसरा के पेट पाल, कर द नेछावर आपन सर्वस्व एह देस पर. धन्य हो...

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लोक कवि अब गाते नहीं – आखिरी कड़ी

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) बीसवाँ कड़ी में भोजपुरी के दुर्दशा पर लोक कवि के दुख पढ़ले रहीं अब पढ़ीं एह उपन्यास के आखिरी कड़ी ….. अबहीं ठीक से भोर भइलो ना रहल कि लोककवि के फोन के घंटी...

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