श्रेणी: साहित्य

महतारी

– केशव मोहन पाण्डेय जोन्हिया काकी पता ना केतना दिन के भइली कि टोला भर के सभे काकीए कहेला. ऊ अपना टूटही पलानी में अकेले अपना बाकी जिनगी से ताल ठोंकेली. उनकर पूत पुरन नवका दुनिया के निकललन. दू-तीन बार पंजाब कमाए गइल रहलन से...

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बतकुच्चन – १०४

“डोलिए में अइनीं, डोलिए में गइनीं, डोलिए में रहि गइल पेट. ए सासु जी तोहरे किरिया सईंया से नाहीं भेंट.” एक जमाना रहुवे छायावादी कवियन के. बात के घुमा के अइसे कहीहें कि कुछ लोग बूझी कुछ ना. कविता के खजुराहो जस होला...

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होली के हुड़दंग : लोक साहित्य का संग

– डा॰ रामरक्षा मिश्र विमल होली, होरी भा फगुआ जवन कहीं, हटे एकही. साँच पूछीं त हम एह अवसर पर रंग खेलला आ हुड़दंगई के पक्षपाती हईं. जइसे बियाह शादी का अवसर पर मेहरारुन के गारी गावल हमरा बिल्कुल वैज्ञानिक लागेला, ओसहीं फगुआ के...

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