खइले रहीं कसम
– अभयकृष्ण त्रिपाठी खइले रहीं कसम अब कलम ना उठाएब, सबसे पहिले मन के अन्धकार मिटाएब. दिन बीतल युग बीतल बीत गइल हर काल, मोहमाया के चक्रव्यूह के नाही टूटल जाल. खाली हाथ जाए के बा पर गठरी ठूस रहल बानी, झूठा शान खातिर अपनन के...
Read More– अभयकृष्ण त्रिपाठी खइले रहीं कसम अब कलम ना उठाएब, सबसे पहिले मन के अन्धकार मिटाएब. दिन बीतल युग बीतल बीत गइल हर काल, मोहमाया के चक्रव्यूह के नाही टूटल जाल. खाली हाथ जाए के बा पर गठरी ठूस रहल बानी, झूठा शान खातिर अपनन के...
Read More– डा॰अशोक द्विवेदी कविता का बारे में साहित्य शास्त्र के आचार्य लोगन के कहनाम बा कि कविता शब्द-अर्थ के आपुसी तनाव, संगति आ सुघराई से भरल अभिव्यक्ति ह. कवि अपना संवेदना आ अनुभव के अपना कल्पना शक्ति से भाषा का जरिए कविता के...
Read MorePosted by Editor | Oct 15, 2012 | कविता, पुस्तक चर्चा, सरोकार |
काल्हु अतवार १४ अक्टूबर का दिने बलिया के श्रीरामविहार कालोनी स्थित “पाती” पत्रिका आ विश्व भोजपुरी सम्मेलन के बलिया कार्यालय पर एगो विचार आ कवि गोष्ठी भइल. एह गोष्ठी में पाती पत्रिका के सितम्बर अंक के विमोचन का साथे...
Read More– डा॰अशोक द्विवेदी तुहीं बतावऽ जागी कबलें केकरा खातिर रात-रात भर? खाए के बा अखरा रोटी सूते के बा घास-पात पर! तुहीं बतावऽ जागी कबलें केकरा खातिर रात-रात भर? अपना खातिर, तोहरा खातिर भा अझुराइल सपना खातिर विघटब-टूटन-फिसलन...
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