सूतल सरकार बा!

– रामसागर सिंह

#भोजपुरी कविता #रामसागर सिंह

सूतल सरकार बा!

गंगा में पानी बढ़ियाइल मचल हाहाकार बा,
केतने बरिस से गोड़ तानि के सूतल सरकार बा!

हर साल के खेला इहे,
लउके इहाँ झमेला इहे,
खेत खरिहान त गइबे कइल कटत घर दुआर बा,
केतने बरिस से गोड़ तानि के सूतल सरकार बा!

मड़ई, फूस, पलानी बहल,
सगरी दाना पानी बहल,
बिलखत मनई माल मवेशी एके नाव सवार बा,
कतने बरिस से गोड़ तानि के सूतल सरकार बा!

पेट काटि जोगावल सगरी,
कोठी महल बनावल सगरी,
गंगा जी के कोप ले गइल सभे बनल लाचार बा,
केतने बरिस से गोड़ तानि के सूतल सरकार बा!

के लोगवा‌ के सुनवईया बाटे,
केहु ना पीर हरवईया बाटे,
रामसागर जिनिगी भाग भरोसे परल ई मझधार बा,
केतने बरिस से गोड़ तानि के सूतल सरकार बा!
————-
रामसागर सिंह,
सिवान, बिहार

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