ले गोतिन लुगरी, हम तू बरोबरी
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-39
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

ले गोतिन लुगरी, हम तू बरोबरी

आजु आठे बजे लभेरन आ गइल रहन बाकिर काकी टीवी का सामने से हटे के नाँवे ना लेत रही। तमिलनाडु के वोट-गिनती पर उनुकर नजर जमल रहे। कहतारी कि बतावऽ, जितला पर सभ दुलहन के आठ ग्राम सोना, मेहरारुन के अढ़ाई हजार महीना आ साल में छव गो गैस सिलिंडर मुफ्त, 200 यूनिट बिजली मुफ्त का अलावे काम भर बेरोजगारी भत्ता, कर्ज माफी आ धोकरी भरिके नवजवानन के नोकरी जइसन प्रलोभन दिहल जाई त के ना भोट दिही?

लभेरन बोलले- ए काकी केहूँ दूध के धोवल नइखे। ई प्रलोभन के नइखे देत? केहूँ साइकिल, त केहूँ लैपटॉप देता, केहूँ बिजली माफ करता त केहूँ कर्ज माफ करता। नोकरी देबे के बात त सभ केहूँ अइसे करता जइसे अपना घर से देता लोग। सभ के ऊहे हाल बा काकी! ले गोतिन लुगरी, हम तू बरोबरी!

काकी के दूनो नतिया चुपचाप अपना हिसाब से बात के बूझे के कोशिश करत रहन स। बाकिर जब लभेरन लुगरी वाली कहाउत कहले त ऊ समुझ से एकदम बाहर हो गइल। छोटका पुछलसि कि अंकल इसका मतलब क्या हुआ? ओहमें काकी अउर जोरि दिहली- “इहनी के कहाउत के माने त बतइबे करऽ आ सङहीं ईहो बताव कि एह कहाउत का पीछे कहानी का रहे।” लभेरन बतावे शुरू कइले।

आदमी बड़ ना होखे, समय बड़ होला। एगो गाँव में दू गो गोतिन रहत रही स। बड़की के नइहर तनी संपन्न रहे, एहसे ऊ हरमेस छोटकी के नीचा देखावे में कवनो कोर-कसर ना राखत रहे। ओकरा के जब देखीं, अपना गहना-गुरिया आ महङा-महङा साड़ी के बखान करत रही आ छोटकी के ताना मारत रही कि तहरा भागि में कहाँ बा अइसन दिन? छोटकियो कवनो कम ना रहे। ऊ अपना चतुराई आ फुर्ती से घर में धाक जमा लेले रहे आ मोका मिलते बड़की का साड़ी-कपड़ा में कवनो ना कवनो खोट निकाल देइ। दूनों का बीच के बिना आवाज के ई झगड़ा बहुत दिन से चलत रहे। इहनी से घरो वाला परेशान रहन स।

एक दिन गाँव में भयंकर आगि लागि गइल। देखते देखत पूरा मोहल्ला आग का चपेट में आ गइल। आधा रात के बेरा रहे, सभ कइसहूँ आपन जान बचाके भागत रहे। बड़की आ छोटकी आपन-आपन कीमती साड़ी आ गहना समेटे में लागल रही स। एही में आगि दरवाजा तक पहुँचि गइलि। अब त बिना कुछ सोचले-समुझले जवने मिलल, ऊहे पहिनि के भागे में भलाई रहे। भोर होत-होत आगि बुता गइल रहे। बड़की, भागा-भागी में एगो ‘लुगरी’ लपेटि लेले रहे आ छोटकी के साड़ी जगह-जगह से जरि गइल रहे, माने ऊहो फाटले-पुरान कपड़ा में रहे।

होश आवते बड़की अपना फाटल-पुरान लुगरी के छिपावे लागलि बाकिर आदति ना छूटलि रहे, त छोटकी के जरल-फाटल साड़ी देखिके ताली पीटि-पीटि के हँसे लागलि। ओकरा ई होश ना रहे कि आपन हालत देख लेउ। छोटकी जब बड़की के देखलसि त कनखी पर मुसुकाइलि आ आराम से आपन लुगरी लहरावत कहलसि- “काहें हँसतानी दीदी? अब का जेठानी आ का देवरानी! ले गोतिन लुगरी, हम तू बरोबरी!” एकर माने बुझलऽ लोग? एकर माने ई भइल कि जब दू लोगन के बीच का सामाजिक भा आर्थिक हैसियत के अंतर खत्म हो जाला, तब एह कहाउत के प्रयोग होला। एकर माने भइल कि “अब नु तोहरा भीरी कुछ बाँचल, नु हमरा भीरी, अब हमनी दूनो बराबरे बानी जा। साँच त ईहे बा कि आफति आ समय के जब चक्र चलेला त बड़-बड़ महल आ घमंड चकनाचूर हो जाला। मनुष्य अपना नंगा सच्चाई में एक-दोसरा के बरोबरे बाटे।

काकी कहली कि ठीके कहतार। हर क्षेत्र में ई सच्चाई लइकेले। अब देश का मौजूदा राजनीतिए के बात कइल जाउ त जनता एह बात के नीमन से बूझि गइल बिया कि पाटी चाहे कवनो होखे, सत्ता में अइला का बाद उहनी के तौर-तरीका एके जइसन हो जाला। कवना पाटी के नेता दल ना बदलेले सन आ तबो अपना के दूधे के धोवल बतावेले सन। सत्ता बदलते पहिले वाली पाटी पर सत्ता पक्ष का ओर से भ्रष्टाचार के आरोप लागे शुरू हो जाला।

लभेरन एही में जोरले- करोना (कोविड-19) का बेरा देखलीं? कहाँ कवनो भेद रहि गइल रहे गरीब आ अमीर में? प्रकृति के प्रकोप का सामने अमीर आ गरीब- दूनों के लाचारी एके नियन रहे। सभ ओइसहीं भागत रहे, छटपटात रहे अपना आदिमी खातिर बेड से लेके आक्सीजन तक खातिर।

काकी कहली- हमरा त तब बहुत खराब लागेला, जब दू गो भोजपुरिहा बड़हन गायक गावेले कम आ एक-दोसरा के नीचा देखावे के कोशिश करेलन आ अंत में दूनो जाना एके जइसन फूहड़ भा सस्ता कंटेंट के सहारा लेलन। ऊहे…हम तू बरोबरी!

लभेरन कहले कि ठीके कहतानी काकी। ई सभ जानता कि एक दिन सभके ई धरती छोड़िके जाए के बा, बाकिर तबो पता ना काहें अतना घमंड में जीएला लोग। एक ना एक दिन सभे ई समुझ जाला, बाकिर तब तक बहुत देर हो जाला आ अफसोस का अलावा केहूँ के कुछऊ ना भेंटाला।

——————————————-


संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030

0 Comments

पाठक-पाठिकन के राय विचार प्रतिक्रिया..