भोजपुरी संगम के 195 वीं ‘बइठकी’
“स्वस्थ परंपरा कऽ तिउहार हवे सतुआन : वागीश”

गोरखपुर। भोजपुरी संगम के 195 वीं ‘बइठकी’, बशारतपुर, गोरखपुर में, संस्था कार्यालय पर वरिष्ठ रचनाकार चन्द्रेश्वर ‘परवाना’ के अध्यक्षता आ अवधेश शर्मा ‘नंद’ के संचालन में दू सत्र में आयोजित भइल।
पहिलका सत्र में ‘बतकही’ के अंतर्गत चर्चा करत बागेश्वरी प्रसाद मिश्र ‘वागीश’ जी सतुआन के खाली सतुआ खइले के तिउहार नाहीं बलुक प्रकृति के साथे जुड़ले, बदलत मौसम आ ग्रह-गोचर के अनुरूप स्वस्थ खान-पान, आहार-विहार, सामाजिक हर्ष उल्लास आ वैज्ञानिक अउर आध्यात्मिक ढंग से चिरंजीव सनातन थाती के रखावत एगो महान परंपरा बतवनी। उहाँ के सतुआन के ऐतिहासिक प्रसंगों के चर्चा कइलीं।
रवीन्द्र मोहन त्रिपाठी जी सतुआ के सात अनाजन (सतंजा) से बने वाला वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित आ आजु के दौर के श्रेष्ठ पौष्टिक भोजन बतवलीं। ओहीं अरविंद ‘अकेला’ जी ए के गरीबन के जल्दी आ अभाव में तैयार होखे वाला फास्ट-फूड कहलीं। अउरो लोग टिप्पणी करत सतुआ के आजो पुरहर प्रासंगिक बतवलें।
दुसरे सत्र के शुरुआत अरविंद अकेला के वाणी वंदना – ‘अरजि सुन लीं मोर भवनियाँ, अबकी बेरिया’ से भइल। शम्भू सज़ल अपने गीत में गाँव के बोली के महत्व बतवलीं- बड़ा नीक लागे तोरे गंँउवा के बोली’। रामसमुझ सांँवरा महंगाई के समाधान दिहलें-‘डँटि के खेती से रुपया कमाईं, महंगाई हमार दुलहिन हे’। कुमार अभिनीत जी माटी के भगवान के रूप में किसान के चर्चा कइलीं- ‘बतिया करीं किसान के, हम माटी के भगवान के’। अवधेश नंद अपने दोहन से पुरहर आकर्षित कइलीं -‘गुण अवगुण सब के हिया, नंद ढेर भा थोर’।
अध्यक्षता करत चन्द्रेश्वर ‘परवाना’ जी जीवन मर्म के परोसत निम्मन रचना पढ़लीं-‘कहते-कहते हम ना कहलीं, दुख के मोटरी ढोवते रहलीं। वागीश जी के रचना मातृ-नेह के समर्पित रहल- ‘के माई बिनु कोरा में उठाई हमके’। दिनेश गोरखपुरी आ अउर कवि लोग अपने श्रेष्ठतम रचनन से ‘बइठकी’ के समृद्ध कइलें।
इनके अलावा पुरान सिनेमा जगत से जुड़ल विशिष्ट अतिथि बिरजू महतो, डॉ.विनीत मिश्र, कार्तिक मिश्र व कुशाग्र के भागीदारी महत्वपूर्ण रहल।
अंत में भोजपुरी संगम के अध्यक्ष इं.राजेश्वर सिंह जी सगरी कवि आ आइल मेहमानन के प्रति आभार प्रकट कइलीं।
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