एगो छप्पन इहो – बतंगड़ 107

छप्पन के कई गो खासियत होला। कतहीं छप्पन भोग के आनन्द लीहल जाला। कतहीं ‘अबले छप्पन…..’ के गिनिती गिनाला। केहू के सीना छप्पन इंचि के बतावल जाला त केहू के उमिरो अब छप्पन होखे जा रहल बा। आ जब हम ई बतंगड़ करे बइठल बानी त पता ना छप्पन गो पाठक-पाठिका मिलिहें कि ना बाकिर सभे जानिये जाई कि कवन छप्पन कवना बात पर कहल जा रहल बा।
हँ त छप्पन बरीस के होखे जा रहल बबुआ नाहियो त छप्पन बेर गरिया चुकल होखिहें अपना छप्पन इंचि के सीना वाला विरोधी के। आ ई ऊ छप्पन हउवन जे अपना पर फेंकल हर पत्थर के, हर जूता के, हर बान के सम्हार के राख लेलन प्रदर्शित करेला। आ बान के वाण लिखला से ऊ ना होखीत जवन बान लिखला के होखी।
दस रुपिया के झालमूढ़ी आ एक रुपिया के मेलोडी खा के भा खिया के जवन चरचा पा लेबेलन छप्पन इंच के सीना वाला, तवने के बराबरी करे का कोशिश में छप्पन बरीस के बबुआ बउराइल चलत बा। बार बाला के बेटा के जवनो संस्कार मिलल होखो बाकिर अपना लइकाई में जे ‘गली गली में शोर है.. तुम्हारा बाप चोर है” के नारा सुनले होखो ओकरा से कवनो सुशोभित वाणी के अपेक्षा कइलो हद के बहरी के सोच होखी।
मोहब्बत के दोकान चलावे के बात करे वाला बबुआ जतना नफरत के सामान बेचेला ओकर कवनो सीमा ना होखे। कबो खून के सौदागर कह दी, कबो चोर कह दी, कबो डंडा से मारे के बात करी, कबो गद्दार कह दी, कबो कुछ अउर। बाकिर हमनी के ई सोच के चुप रह जाए के होला कि बबुआ बउरा गइल बा कि ओकरा जवन टॉफी चाहत रहल तवन ओकरा मौसी के काहे मिल गइल! छिरियाइल बबुआ छप्पन के होखो त छप्पर फाड़ के चिचियइे करी।
अब रउरो सभे कुछ मंथन करीं कि कवन छप्पन कवना छप्पन ला।


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