कनक किशोर के कुछ कविता
- टीम अंजोरिया

 

कनक किशोर के कुछ कविता

दू दूनी पांच

 

समय बदलल

गाँव के माटी चलल

शहर के राहि

शहर तीन पांच बेसी जानेला

निनानबे के फेर में रहेला

गाँव काहे रहे पीछे

दु दुनी का पांच कहि

दिने में ठगेला।

 

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बड़का ठग

 

ललनवा अब ऊ ना रहल,

अलग बात बेवहार

बाटे जब से नेता भइल,

रोज नया रोजगार

संग चले चमचन जोरे,

बोले फारसी बोल

कहे राम के भक्त हईं,

सांचे ऊ चंदा चोर।

उजर कपड़ा मन के करिया,

चाम चोर बेजोड़

कुर्सी से चिपकल बा नतिया,

रोज नया गँठजोड़

वादा, जुमला, चंदन – टिका,

सबसे बड़का ठग ह

कनक कबीर मन डर भरल,

लेले घुमस हड़जोड़।

——–

 

टूटल आस

 

पिया मिलन के आस

पिया ना अइले

टूटल आस,

चुनाव के वादा

खूब बाजल ढोल बाजा

कुर्सी मिलते

भुला गइले राजा,

टूटल सपना

सोचनी भोट में बताइब

ई भी एम के खेल देखीं

भोटो खा गइल।

——–

लोकतंत्र के पुकार

 

अब ऊ दिन ना रहल कि

हमरा हिस्सा के घूप

चुरा लेब

आ हम चुप रहब,

अब ऊ दिन ना रहल कि

कमाईं हम

आ खइब रउवा

आ हम चुप रहीं,

अब ऊ दिन ना रहल कि

परधानी आ पगड़ी

रउवा माथे

आ मुँह पर जाब हमरा,

समय बदलल

चेतीं

मिलजुल के सिरिजीं

नया समाज

कहत बिया सरकार

लोकतंत्र के इहे पुकार।

——

 

सुराज के भेंट

 

रामजी के चिरई, रामजी के खेत

खाले चिरई भर – भर पेट

देश में आई कब अइसन बेरिया

परजा के मिली सुराज के भेंट,

करजे से लउकत विकास के खेल

कर के भार से दबल बा देश

भयंकर जुद्ध से त्रस्त आजु दुनिया

ट्रम्प के जाल में फँसल बा देश,

पीटीं थरिया, जराई खूब दीपक

बिपत्त भगाई राजा के सनेस

भागी ना बिपत्त, बिलाई संस्कृति

कनक कबीर बाड़े चिंतित विशेष।

—-

जीए भर जुगाड़

 

धरम में कबले भुलवाइब?

जाति – पाति में

जनि बान्हीं

का भेंटाई?

आदमी हईं

रोटी, कपड़ा, मकान

के जरूरत बा,

कब ले भुलवाइब

झूठ वादा आ जुमला में,

हमरा हिस्सा के

जीये भर जुगाड़ दे दीं

आ तनिका सम्मानो।

—–

कबले रहब चुप?

 

सत्ता के दृष्टिकोण

बदल गइल बा

ई कवनो अजरज के

बाति नइखे,

सत्ता के स्वार्थ

में डूबल

कुर्सी खातिर

जन भावना के कुचलल,

ना उचित कहाई

काहे कि ऊ

हमार सपना के हत्या ह,

अन्हार चहुंओरि पसरल बा

कबले रहब चुप?

——

बेरोजगारी

 

बेरोजगारी में

घर – परिवार के

दाल – रोटी के सहारा

चाय – पकौड़ी के ठेला

जुगाड़ बा जिनिगी खेवे के,

बेरोजगारी में

बाबूजी के दवाई

माई के फाटल लुगा

का देखीं भाई

आँगन दुख से भरल,

बेरोजगारी में

मेहरारू के सपना

लइकन के लइकाईं

लूटात देखीं चुप बानीं

अँखियाँ नइखे चुपात।

——

रोजगार

 

दंगा के आग में

रोटी सेंके वाला जमात

हम ना

ना हमरा बाबरी मस्जिद

ना राम मंदिर से

कुछ लेवे के बा

ना तोहार

राजनीति से

हँ! रोटी खातिर

रोजगार

अपना आ परिवार खातिर

जरूरत बा

ओह रोजगार के

दंगा आ राजनीति खेल में

जनि जारऽ

—–

दंगाई

 

ना ऊ मुसलमान होखे

ना हिन्दू

दंगाई के जाति

आ धर्म ना होखे

उन्हिन के दरिंदों कहल

दरिंदों के

अपमान होई।

———

बदलाव

राम भक्त भुलाइल जा ताड़े

गीता – पाठ

मौलाना भुलाइल जात बाड़े

कुरान – गीत

इस्लाम के मूल अर्थ

शान्तिप्रियता

हिन्दूत्व के ज्ञान सार

समता – समरसता

लोप हो रहल बा

देश से

मजहब आ धर्म के अर्थ

छेनी से वार करि

तूड़ल जा रहल बा,

बदलल जा रहल बा

पार्टी के अलिखित

संविधान के अनुरूप

मानवता के धरातल पर

खड़ा पुलिया के

तोड़ के।

नइखे सुनात कहीं

प्रेम गीत।

—–

सत्ता आ कुर्सी

 

राजा के

ना राम से कवनो मतलब

ना रहीम से लेना – देना

ओकर खुदा

सत्ता आ कुर्सी।

—-

नाचीं

 

नाचल जरूरी बा

बाकिर

बाजार जोरे ना,

मांदर के थाप पर

माटी से सराबोर थाप पर

भजन के करतल ताल पर

नाचीं।

——

कनक किशोर

चलभाष – 9279200401

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