अपने-अपने युद्ध
- टीम अंजोरिया

पचीस साल में अगर कवनो उपन्यास के 22 गो संस्करण छप जाव त कुछ त बात जरुरे होखी। एह उपन्यास के मशहूर लेखक दयानंद पांडेय जी के नाम हिन्दिए ना, अनेके भाषा में जानल पहिचानल बा। पांडेय जी के दू गो उपन्यास ‐ लोक कवि अब गाते नहीं आ बांसगांव की मुनमन – के भोजपुरी अनुवाद अँजोरिआ पर छपला का बाद किताबो का रुप में छप चुकल बा।

पांडेय जी के उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ साल 2001 में पहिला बेर छपल रहल आ तबसे अबले एकर 22 गो संस्करण छप चुकल बा। एह उपन्यास के हम बहुत पहिले पढ़ लिहले रहीं। तब बांसगांव के मुनमुन के अनुवाद शुरुओ ना कइले रहीं। बाकिर ‘अपने-अपने युद्ध’ के भोजपुरी में अनुवाद अपना माई के छिनार कहे वाला लठधरन से अझुराए का डर से ना कइनीं। जबकि ई उपन्यास आम भोजपुरिया चटकार ले के पढ़िहें। आज ओह डर से निजात पा के एहू उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद शुरु क दिहले बानी।

 

एह दशक में मीडिया का भीतर, आ बाहरो, चरचा में रहल दयानंद पांडेय के उपन्यास ‘अपने-अपने युद्ध’ के जतना बेर पढ़ल जाव, अखबारी दुनिया के ओतने फूहड़ परत उघरात चल जाली सँ। मीडिया के जतना तेजी से बाजारीकरण हो रहल बा, ओकरा भीतर के नरको ओतने भयावह होत जात बा। अइसना में ‘अपने-अपने युद्ध’ के बेर-बेर पढ़ल एकदमे ताजा-ताजा लागेला। ई खाली कवनो औपन्यासिक कृति भर नइखे, मीडिया आ संस्कृति-जगत के दोसरा घटकन—थिएटर, राजनीति, सिनेमा, सामाजिक न्याय आ न्यायपालिका—के भीतरी दुनिया में धँस के लिखल एगो तीख, बेलौस, खुलल वृत्तांत हवे। एह में बहुते कुछ नंगा बा—असहनीय आ तीख। लेखक के अपने कहनाम बा—‘जइसे कवनो मीठ आ नरम ऊख के पोर अचानक खुल जाला, अपने-अपने युद्ध के पात्रो ओइसहीं खुलत चल जालें।’

 

‘अपने-अपने युद्ध’ असल में विरोधी रंगन से बनल एगो कोलाज हवे, जवना के फलक पर कई-कई चरित्र आपन-आपन लड़ाई लड़ रहल बाड़ें। एह में प्रमुख बाड़ें मीडिया, खास क के प्रिंट मीडिया के लोग। देह आ आत्मा के सरहद पर आपन-आपन महाभारत रचत। संजय एकर मुख्य पात्र बा—अर्जुन के भूमिका करत-करत अभिमन्यु आ फेर एगो नया अभिमन्यु के भूमिका में बन्हाइल ना, बिंधाइल। शराब आ कैरियर के तरको एकर हथियार बाड़ें—अपना लोग से आ अपना से लड़े खातिर। ‘अपने-अपने युद्ध’ में प्रेमो बा आ प्यार करे वाली मेहरारुओ बाड़ी सँ; कहीं मन जीतले, कहीं देह जीतले, आपन अस्तित्व खोजत-हेरत, अकेलापन बाँटत, जोड़त, तोड़त। आपन-आपन दुख बा। आपन-आपन संत्रास। ई एगो जटिल, नंगा आत्मयुद्ध हवे—मीडिया, राजनीति, थिएटर, सिनेमा, सामाजिक न्याय आ न्यायपालिका के दुनिया के चरित्रन के एगो अन्तहीन आपसी युद्ध, जवना में पक्ष-प्रतिपक्ष बदलत रहेलें। एही अर्थ में ई उपन्यास एगो अन्तहीन सवाल हवे—जवना के जवाब फिलहाल उपलब्ध नइखे!

 

2001 में जब ई उपन्यास छप के आइल रहल त एकरा पर आरोपन के बौछार जइसन हो गइल रहल। अश्लीलता से ले के अवमानना ले के बात उठल रहल। ई उपन्यास प्रिंट मीडिया के नरक पर लिखल गइल रहल आ प्रिंट मीडिया में एकरा के ले के ब्लैक-आउट जइसन हालत रहल। भाई लोग कहल कि कुकुर कुकुर के मांस ना खाला। अजीब रहल ई तरको। अखबार मालिकन का नजर में पतिव्रता सती सावित्री बनल रहे के जइसन दौर आज बा, तबहियो रहल। चुभन आ छटपटाहट का बावजूद गहिर चुप्पी रहल। उपन्यास प्रिंट मीडिया के ले के रहल, एहसे एकर सरोकारो अउरी रहल। न्यायपालिका से गहिर अर्थ में एह उपन्यास के सरोकार रहल। प्रिंट मीडिया में भले ब्लैक-आउट जइसन हालत रहल, बाकिर न्यायपालिका के ई उपन्यास चुभ गइल। इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच में कंटेंम्ट ऑफ कोर्ट हो गइल त जइसे लोग नींद से जागल। बाकिर चुप्पी के चादर ओढ़ले।

 

साहित्य से जुड़ल पत्रिकन के साँस खुलल। तमाम पत्रिकन में चरचा आ समीक्षा के जइसे बाढ़ आ गइल। ‘हंस’ में राजेंद्र यादव समीक्षा त छपबे कइलें, चार पन्ना के संपादकीयो लिखलें—‘केशव कही ना जाये क्या कहिए’ शीर्षक से—आ सुविधाभोगियन, व्यवस्थाजीवियन के दउड़ा लिहलें। ‘जनसत्ता’ में राजकिशोर अपना कालम में लमहर चरचा कइलें आ लिखलें कि अगर पत्रकारितो के आपन कवनो हाईकोर्ट रहित त हमनी के विश्वास बा कि उपन्यासकार ओहू में प्रतिवादी बन के खड़ा रहित। रवींद्र कालिया मान दिहलें आ बतवलें कि कमलेश्वरो पर एक बेर अवमानना के मुकदमा चल चुकल बा। कमलेश्वर एकरा से छुटकारा पावे के तरीको बतवलें आ हौसलो बढ़वलें। खैर, हालत ई बा कि प्रिंट मीडिया में यातना अउरी सघन भइल बा। चैनलन के घटाटोप सभका के लील लिहल चाहत बा, प्रिंट मीडियो के, बाकिर एकरा विरोध में कहीं केहू साँस लेत नइखे लउकत। अखबार अब विज्ञापन का साथे खबर छापे के रेट कार्डो खुल्लमखुल्ला छापे लागल बाड़ें। संपादकीय के नाम पर खबर दिहल प्राथमिकता में नइखे, अब बिजनेस दिहल प्राथमिकता बा। ब्यूरो अब नीलाम हो रहल बाड़ें। मेधावी लोग ओहिजा काम करे ला अभिशप्त बा। केहू कुछ बोलल त दूर, सुविधा के चासनी में लपटाइल एह बढ़त कोढ़ का ओर तकलो नइखे चाहत। काहे?

 

एहीसे इहाँ ‘अपने-अपने युद्ध’ के प्रासंगिकता अउरी बढ़ जात बा।

अनुवाद के पहिलका कड़ी जल्दिए रउरा सोझा आइल शुरु होखी।

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