लालच के मकड़जाल
– डॉ॰ उमेशजी ओझा सरोज एगो कम्पनी मे काम करत रहले. अपना पत्नी आ दूगो बेटा, सबीर आ शेखर, का साथे आपन चारिगो आदमी के छोट परिवार में मस्त आ हँसी खुशी से रहत रहले. बाकिर दूनो बेटा आवारा किस्म के रहले. ओह में से उनकर बड़ बेटा...
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Read MorePosted by Editor | Sep 18, 2014 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
भोजपुरी अबहीं संविधान के अठवीं अनुसूची में शामिल होखे खातिर संघर्ष करत बिया. जबकि भारत के साहित्य अकादमी भारतीय साहित्य निर्माता का रूप में भिखारी ठाकुर आ धरीछन मिश्र का बाद अब भोजपुरी के नामी गिरामी कवि मोती बीए पर एगो किताब...
Read More(1) छलकत तलफत नजर, त बरबस गजल भइल. लहसल लहकत दहर, त बरबस गजल भइल. अद बद पनघट पर जब परबत पसर गइल, सइ-सइ लहरल लहर, त बरबस गजल भइल. चटकल दरपन चमकल दहक-सहक बन-बन, समय गइल जब ठहर, त बरबस गजल भइल. अलकन पर, मद भरल नयन, मनहर तन पर,...
Read More-(स्व॰) हीरा डोम हमनी के राति दिन दुखवा भोगत बानी हमनी के सहेबे से मिनती सुनाइबि हमनी के दुख भगवनवो न देखता जे हमनी के कब से कलेसवा उठाइबि पदरी सहेब के कचहरी मे जाइबि जा बेधरम होके रंगरेज बनि जाइबि हाय राम! धरम न छोड़त बनता बा जे...
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