श्रेणी: साहित्य

बेटा अफसर बाड़ें

– डॉ.रमाशंकर श्रीवास्तव बाबूजी के केतना हाली समझवले होखब कि रउआ हमरा के अफसर मत कहीं. बड़का तनखाह पवला से का भइल, हम त सरकारी दफ्तर के एगो कलर्को से गइल-गुजरल बानी. रउआ मन में अपना जमाना के इयाद सटल बा. अंगरेजन के समय रहे....

Read More

आदमी बाड़न? (ललित निबन्ध)

– रामजीत राम बेटा के आदमी बनावे के तइयारी बड़ा जोर से बा कि बेटा के पढ़ाइब आ आदमी बनाइब. आजु आदमी के अरथ बदल गइल बा. इ देखि के कि आदमी बने आ बनावे के कला एतना तेज हो गइल बा कि डर लागता. एह तुफान के आवेश में सब मर्यादो टूटे...

Read More

दू गो गीत

– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ पहिल गीत कवन गाईं एह गीतन का गाँव में पाहुन-सन मन रहल लजाइल. धनखेती में फूटल सोना रुपनी बइठल बीनत मोना जाँता से जिनिगी लपटाइल छंद झर रहल घर का कोना पाकड़ का पतइन से चिरइन के शब्द झरल...

Read More

कबीर

– डॉ० हरीन्द्र ‘हिमकर’ मत पूछीं कथा जलम के कुछ कथा गढ़े दीं हमके ई बोलत चलल कबीरा हीरदा से निकलल हीरा. हे माई ! त जनि बोलऽ ऊ दरद कहीं जनि खोलऽ आँखिन का पानी से तू अपना अँचरा के धो लऽ. अपना छप्पर छान्ही में गंगा...

Read More

भूत होला का ?

– ‍नीमन सिंह बात १९८० के बरसात के समय के ह. हमरा खेत में धान रोपे खातिर बेड़ार में बिया उखाड़े लागल मजदूर बिया उखाड़त रहले सन. बगल में भिंडा रहे पोखरा के एक तरफ, दोसरा तरफ मुरघटिया रहे. मजदूरन में एगो मजदूर ६ फीट लमहर बाकिर...

Read More

Recent Posts