गज़ल
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 5वी प्रस्तुति ) – शशि प्रेमदेव गाँधी जी के बानर, बनि गइले पर नीक कहाइबि हम। साँच बात कहि के ए दादा, माथा ना फोरवाइबि हम। मन के कहना मान लेबि तऽ कबहूँ ना पछताइबि हम। बेसी चतुर...
Read MorePosted by Editor | जनवरी 21, 2012 | कविता, पुस्तक चर्चा, साहित्य |
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 5वी प्रस्तुति ) – शशि प्रेमदेव गाँधी जी के बानर, बनि गइले पर नीक कहाइबि हम। साँच बात कहि के ए दादा, माथा ना फोरवाइबि हम। मन के कहना मान लेबि तऽ कबहूँ ना पछताइबि हम। बेसी चतुर...
Read MorePosted by Editor | जनवरी 21, 2012 | कविता, पुस्तक चर्चा, साहित्य |
पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 4थी प्रस्तुति – हीरालाल ‘हीरा’ अकसर एके संगे खइले सँगे मदरसा पढ़हू गइले एक्के अँगना खेलत-कूदत दिन-दिन बढ़ल उमिरिया रे। दू भई का नेह क चरचा सगरो गाँव नगरिया रे । भव भरल भटकाव न...
Read MorePosted by Editor | जनवरी 20, 2012 | पुस्तक चर्चा, सरोकार, साहित्य |
सामयिकी आधी आबादी के बदलत चेहरा – आस्था जिनिगी में, हार, असफलता आ पीछे छूटि गइल आम बात हऽ. सपना पूरा ना भइल त एकर मतलब ई ना हऽ कि सपना देखले छोड़ दिहल जाव. उमेद मुए के ना चाहीं. उमीद आ सपना जिया के राखल आ ओके पूरा करे...
Read MorePosted by Editor | जनवरी 20, 2012 | पुस्तक चर्चा, सरोकार, साहित्य |
दखल नया बदलाव क इतिहास रचे वाला साल के विदाई ! – प्रगत द्विवेदी नया साल के खुशमिजाज सलाम का साथे, बीतल बरिस के खटमिठ अनुभवन क इयाद आइल. नवका सत्र के, नया ‘सनेस‘ में हमके इहे बुझाइल कि हमहन के देश तमाम तरह के संकटन से...
Read MorePosted by Editor | जनवरी 19, 2012 | पुस्तक चर्चा, सरोकार, साहित्य |
(हमार पन्ना) [एक] ‘भ्रष्टाचार’ पर राजनीति आ लोकतंत्र के ‘लोकपाल’ सर्वव्यापी राजनीति के पहुँच आ पइसार हर जगह बा त हमनी के जीवन क जरूरी हिस्सा बनल भ्रष्टाचार भला काहें अछूता रही? राजनीति में भ्रष्टाचार आ भ्रष्टाचार पर राजनीति अब...
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