बांसगांव की मुनमुन
(दयानन्द पाण्डेय के बहुचर्चित उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) ‘भतार छोड़ि देब बाकिर नौकरी ना. ’...
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Read Moreखालऽ, खालऽ ए चिरई जवन तोहरा रुचे उड़ते खा, चाहे बइठ के खालऽचाहे अलोता कहीं ले जाके खालऽटुकी टुकी...
Read MorePosted by Editor | Aug 30, 2015 | उपन्यास, पुस्तक चर्चा, सरोकार, साहित्य |
मुम्बई का विले पार्ले स्थित “नवीन भाई ठक्कर सभागार” में “अभियान” संस्था का सहयोग से आयोजित ‘सबरंग फिल्म स्टार सम्मान समारोह’ आ ‘भोजपुरी पंचायत’ वार्षिकोत्सव का अवसर प डा0 अशोक...
Read More– डा॰ अशोक द्विवेदी फजीर होते, भीम आश्रम से निकलि के सीधे जलाशय का ओर चल दिहलन. माता के प्रातः दरसन आ परनाम का बाद, उनसे कुछ सलाह निर्देश मिलल. माता कहली, ”हम चाहत बानीं कि तूँ हिडिमा का सँगे अधिका से अधिका समय बितावऽ!...
Read More– डा॰ अशोक द्विवेदी अइसे त प्रकृति के एक से बढ़ि के एक अछूता, अनदेखा मनोहारी रूप ओह विशाल बनक्षेत्र में रहे बाकिर कई गो मुग्ध करे वाला जगह, हिडिमा घूमत-फिरत देखले-जनले रहे. सबेरे माता जब ओके भीम का सँग खुला आहार-बिहार आ...
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