फागुनः दू गो गीत
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल!...
Read MorePosted by Editor | Mar 29, 2012 | कविता, पुस्तक चर्चा, साहित्य |
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल!...
Read More– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल एक लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे ! धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके जवानी अँजोरिया गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि...
Read More– ओ.पी. अमृतांशु रंग – अबिरवा लेके गुललवा मस्त फगुनवा आईल बा. केने बाड़ी पुरूवा रानी पछेया बउराईल बा. सरसों फुलाइल, लहराइल बा तीसी, मटर के ढेंढी देखावे बतीसी, झपड़-झपड़ गेहूमा के बालवा कचरी पे लोभाइल बा. मोजरा से रस...
Read MorePosted by Editor | Feb 6, 2012 | कविता, पुस्तक चर्चा, सरोकार, साहित्य |
पिछला दिने पहली फरवरी के मुंबई में भोजपुरी के एगो खास काव्य संध्या के आयोजन भइल. खास एह माने में कि मराठी भाषी प्रबुद्ध लोग के मानस के मर्म छू लिहलसि भोजपुरी कविता. आयोजन करवले रहल सामाजिक सांस्कृतिक संस्था “सेतु” आ...
Read More– डॉ.कमल किशोर सिंह देखलऽ कइसन सपनवा, बाबा बोलऽ ना पूछेला जहनवा सब बच्चा बुढ जवनवा बाबा बोलऽ ना……. देखलऽ कइसन सपनवा, बाबा बोलऽ ना. मौन काहे बाड़ऽ, काहे कइलऽ अनसनवा, बोलऽ कइसे होई तहार मनसा पुरनवा बाबा बोल ना...
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