Category: सतमेझरा

कमान आ कमीना का बहाने (बतकुच्चन – 192)

भासा संस्कार से बनेला आ संस्कार भासा से. भासा संस्कार देखावेले आ संस्कार भासा के इस्तेमाल के कमान सम्हारेले. कमान सम्हारे खातिर कई बेर कमानी चढ़ावे पड़ेला आ कई बेर कमाने से काम चल जाला. एह कमाने आ कमाई वाला कमाने के कवनो संबंध...

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फेस बुक के दुखिया

– जयंती पांडेय ओह दिन साइत बिगड़ल रहे कि आंगछ खराब रहे. गाँव के लरिका मधुमाछी के छत्ता में ढेला मार के परइले सन. ओने रामचेला जेठ के दुपहरिया में पछुआ के झोंका के कम करे खातिर आँख मुलमुलावत पेड़ का नीचे आगे के ठाड़ भइल...

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लीनक्स आ विंडोज का बहाने भोजपुरी के चरचा (बतकुच्चन – 190)

कंप्यूटर के दुनिया में दू तरह के साफ्टवेयर होला. एगो त प्रोप्राइटरी, जवना के मलिकान कुछ खास लोग का लगे होला आ उहे लोग तय कर सकेला कि एहमें का रही, कइसे रही, का करी वगैरह. दोसरका होला ओपन सोर्स, जवना के मलिकान केहू का लगे ना...

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जब घूर के दिन फिरेला

– जयंती पांडेय बाबा लस्टमानंद से रामचेला पूछले, ‘बाबा हो, ई घूरो के दिन कइसे फिरेला?’ बाबा कहले, ‘जे तहरा एकर उत्पत्ति आ टीपण जाने के होखो त भोजपुरिका में बतकुच्चन करे वाला डाक्टर साहेब से सवाच ल. हम त...

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नवका रहन अउर चाल ढाल

– जयंती पांडेय गरमी के पसीना से तर-बर भइल रामचेला हाफत-डाफत गुरू लस्टमानंद का लगे पहुँचले. सस्टांग दंडवत कइके आशीर्वाद लेहला के बाद रामचेला कहलन, गुरू आजकाल गउवों में बदलाव के बयार बड़ा तेजी से बहऽता. लस्टमानंद पूछलन,...

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