भोलानाथ गहमरी जी के लिखल एगो निर्गुन

कवने खोतवा में लुकइलू आहि रे बालम चिरई, आहि रे बालम चिरई. बन बन ढुंढली, दर दर ढुंढलीं, ढुंढलीं नदी...

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